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देवभूमि परिवार अधिनियम 2026 पर क्षेत्रीय संगठनों का तीखा विरोध: 15 वर्ष की शर्त अपर्याप्त, मूल निवासियों की चिंता बढ़ी, बाहरी अधिकारियों की साजिश तो नहीं? पर राज्य के जनप्रतिनिधि क्यों चुप?

देहरादून: उत्तराखंड सरकार द्वारा देवभूमि परिवार अधिनियम 2026 लागू किए जाने के बाद राज्य के विभिन्न क्षेत्रीय संगठनों, मूल निवासी मंचों, राज्य आंदोलनकारी समितियों और पहाड़ी युवा संगठनों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जबकि सरकार इसे पारदर्शिता और योजनाओं के बेहतर वितरण का माध्यम बता रही है, विपक्षी आवाजों का कहना है कि यह कानून मूल उत्तराखंडियों की सुरक्षा के बजाय बाहरी तत्वों को लाभ पहुंचाने वाला साबित हो सकता है।

विरोध के मुख्य कारण

क्षेत्रीय संगठनों ने कानून की 15 वर्ष की निरंतर निवास अवधि को सबसे बड़ा कमजोर पक्ष बताया है। उनका आरोप है कि:

  • 15 वर्ष की अवधि बहुत कम है। राज्य गठन (9 नवंबर 2000) के बाद से हजारों बाहरी लोग यहां बस चुके हैं। इस शर्त से वे आसानी से देवभूमि परिवार आईडी प्राप्त कर सरकारी योजनाओं, भूमि संबंधी लाभ और अन्य सुविधाओं का हकदार बन सकते हैं।
  • कानून मूल निवास (Original Resident) की अवधारणा को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। संगठनों का कहना है कि 1950, 2000 या राज्य गठन से पहले के निवासियों को ही मूल उत्तराखंडी माना जाना चाहिए।
  • जनसांख्यकीय परिवर्तन (Demographic Change) की आशंका: पहाड़ी क्षेत्रों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदारी, होटल-रिसॉर्ट निर्माण और बसाव बढ़ रहा है। कमजोर भू-कानूनों के साथ यह कानून मूल निवासियों को और पिछड़ने देगा।
  • डेटाबेस में फर्जीवाड़े की आशंका: 10 वर्ष जेल और 50 लाख जुर्माने के प्रावधान को सख्त मानते हुए भी, क्रियान्वयन पर संदेह जताया जा रहा है।
  • महिला मुखिया प्रावधान को कुछ संगठन सकारात्मक मान रहे हैं, लेकिन इसे मूल निवास सुरक्षा से जोड़े बिना अपर्याप्त बताते हैं।

कई सामाजिक मंचों और फेसबुक-एक्स पर आम जनता की टिप्पणियों में भी यही नाराजगी दिख रही है। लोगों का कहना है कि “15 साल में अवैध घुसपैठिए भी शामिल हो जाएंगे” और “मूल निवासियों को प्राथमिकता नहीं मिल रही”।

संगठनों की प्रमुख मांगें

क्षेत्रीय संघों ने सरकार से तत्काल इन मांगों को पूरा करने की अपील की है:

  1. निवास अवधि बढ़ाई जाए: 15 वर्ष के बजाय 1 जनवरी 2001 (राज्य गठन) या उससे पहले के निवासियों को मूल निवासी मानकर आईडी जारी की जाए। कुछ मांग 1947 या 1950 की कट-ऑफ की भी कर रहे हैं।
  2. मूल निवास प्रमाण पत्र (Original Resident Certificate) को अनिवार्य बनाया जाए और देवभूमि परिवार आईडी को इससे लिंक किया जाए।
  3. भू-कानून सख्ती: पर्वतीय क्षेत्रों में गैर-उत्तराखंडियों द्वारा कृषि भूमि, वन भूमि या आवासीय प्लॉट खरीद पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। मौजूदा भू-कानूनों को और मजबूत किया जाए ताकि मूल उत्तराखंडी भूमिहीन न हों।
  4. प्राधिकरण में स्थानीय प्रतिनिधित्व: देवभूमि परिवार प्राधिकरण में राज्य आंदोलनकारियों और मूल निवासी संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।
  5. पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष प्रावधान: पलायन प्रभावित गांवों और सीमांत क्षेत्रों के मूल परिवारों को अतिरिक्त सुरक्षा और प्राथमिकता दी जाए।
  6. सार्वजनिक सुनवाई: कानून में संशोधन से पहले सभी पक्षों के साथ व्यापक चर्चा और जन सुनवाई आयोजित की जाए।

कई संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो बड़े आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और कानूनी लड़ाई की तैयारी की जाएगी।

मूल निवासियों की पीड़ा

उत्तराखंड के मूल निवासी (खासकर कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में) लंबे समय से महसूस कर रहे हैं कि कमजोर भू-कानूनों, बाहरी निवेश और पलायन के कारण वे तेजी से पिछड़ रहे हैं। युवा रोजगार की तलाश में बाहर जा रहे हैं, जबकि बाहरी लोग यहां की जमीन और संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं। देवभूमि परिवार कानून को कुछ लोग आंशिक राहत मान रहे हैं, लेकिन बिना सख्त मूल निवास और भू-संरक्षण के इसे अधूरा और जनभावनाओं से दूर बताया जा रहा है।

सरकार का पक्ष है कि यह कानून सभी स्थायी निवासियों को लाभ देगा और फर्जी लाभार्थियों पर रोक लगाएगा, लेकिन क्षेत्रीय संगठनों का मानना है कि बिना मूलभूत सुरक्षा के यह देवभूमि की पहचान को कमजोर करेगा।

देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और जनसांख्यकीय पहचान बचाने के लिए अब सरकार पर दबाव बढ़ गया है। सभी पक्षों के बीच संवाद से ही इस विवाद का समाधान संभव है।

जय देवभूमि! जय उत्तराखंड!

(समाचार विभिन्न रिपोर्ट्स, जन प्रतिक्रियाओं और संगठनात्मक बयानों पर आधारित)

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