देवभूमि के लोग | विशेष रिपोर्ट
देहरादून/भानियावाला, 15 जुलाई 2026।
देहरादून–ऋषिकेश के बीच भानियावाला हाईवे चौड़ीकरण परियोजना को लेकर उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण की बहस तेज हो गई है। परियोजना के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की प्रस्तावित कटाई के विरोध में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी), पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सामाजिक संगठन, युवा समूह, छात्र, वरिष्ठ नागरिक और स्थानीय ग्रामीण एकजुट होकर जंगलों एवं वन्यजीवों के संरक्षण की मांग उठा रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उत्तराखंड का भविष्य केवल चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि सुरक्षित जंगलों, स्वच्छ नदियों और समृद्ध जैव विविधता से भी जुड़ा हुआ है।
हाल के दिनों में भानियावाला क्षेत्र में आयोजित विरोध कार्यक्रमों में यूकेडी के कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भागीदारी की। पार्टी नेताओं ने कहा कि विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास स्वीकार्य नहीं हो सकता जो राज्य की प्राकृतिक विरासत को अपूरणीय क्षति पहुँचाए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि सड़क निर्माण की तकनीकी रूपरेखा की पुनर्समीक्षा की जाए, ऐसे विकल्प तलाशे जाएँ जिनसे अधिकतम पेड़ों को बचाया जा सके और वन्यजीवों के प्राकृतिक गलियारों पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
उत्तराखंड की पहचान बचाने का प्रश्न
यूकेडी का कहना है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन का मूल उद्देश्य केवल नया राज्य बनाना नहीं था, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकास सुनिश्चित करना भी था। पार्टी का मत है कि यदि विकास योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी होगी तो राज्य की पहचान, पर्यटन, जल स्रोत और स्थानीय आजीविका सभी प्रभावित होंगे।
पार्टी नेताओं ने विभिन्न सभाओं में कहा कि सदियों पुराने पेड़ केवल लकड़ी नहीं हैं, बल्कि वे भूजल संरक्षण, कार्बन अवशोषण, मिट्टी के संरक्षण और वन्यजीवों के आश्रय का आधार हैं। इसलिए उनकी कटाई को अंतिम विकल्प के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सामाजिक संगठनों का व्यापक सहयोग
भानियावाला आंदोलन में अनेक पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक संगठनों, स्थानीय ग्राम सभाओं, महिला समूहों और युवाओं ने भी भागीदारी की है। विभिन्न स्थानों पर हस्ताक्षर अभियान, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जागरूकता कार्यक्रम और जनसंवाद आयोजित किए गए, जिनका उद्देश्य लोगों को जंगलों और वन्यजीवों के महत्व से जोड़ना है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय ऐसी योजना बनाई जानी चाहिए जिसमें दोनों के बीच संतुलन स्थापित हो सके।
वन्यजीव संरक्षण बना प्रमुख मुद्दा
भानियावाला और जॉलीग्रांट का क्षेत्र वन्यजीवों, विशेषकर हाथियों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि जंगलों का क्षेत्र सिकुड़ता है या प्राकृतिक गलियारे प्रभावित होते हैं तो मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है। यही कारण है कि आंदोलनकारी वैज्ञानिक अध्ययन, प्रभावी शमन उपाय और दीर्घकालिक संरक्षण रणनीति की मांग कर रहे हैं।
उत्तराखंड में पर्यावरणीय आंदोलनों की विरासत
उत्तराखंड लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलनों की भूमि रहा है। जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए समय-समय पर स्थानीय समुदायों ने सक्रिय भूमिका निभाई है। भानियावाला का आंदोलन भी उसी परंपरा का विस्तार माना जा रहा है, जहाँ स्थानीय लोग विकास के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण को समान महत्व देने की बात कर रहे हैं।
जनसमर्थन बढ़ने का दावा
आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्हें राज्य के विभिन्न हिस्सों से नागरिकों, छात्रों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया और जनसंपर्क अभियानों के माध्यम से भी इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा हो रही है। समर्थकों का मत है कि यह केवल एक सड़क का प्रश्न नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उत्तराखंड की प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का विषय है।
सरकार से प्रमुख मांगें
आंदोलनकारी और विभिन्न सामाजिक संगठन सरकार से मांग कर रहे हैं कि—
- परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों की पारदर्शी समीक्षा की जाए।
- जहाँ संभव हो, सड़क की रूपरेखा में परिवर्तन कर अधिकतम पेड़ों को बचाया जाए।
- वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक उपाय लागू किए जाएँ।
- स्थानीय समुदायों और पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
- प्रतिपूरक वृक्षारोपण के साथ-साथ पुराने वृक्षों के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
पर्यावरण भी जरूरी
भानियावाला हाईवे चौड़ीकरण को लेकर चल रहा विरोध उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर गंभीर विमर्श का अवसर बन गया है। उत्तराखंड क्रांति दल तथा अनेक सामाजिक संगठनों की भागीदारी ने इस मुद्दे को व्यापक जनचर्चा का विषय बना दिया है। आने वाले समय में परियोजना से जुड़े निर्णय इस बात की परीक्षा होंगे कि राज्य आधुनिक आधारभूत ढाँचे के विकास और अपनी अमूल्य प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है।

