हल्द्वानी/रानीबाग, 15 जुलाई 2026।
उत्तराखंड के रानीबाग क्षेत्र में भूमि संरक्षण को लेकर चल रहे आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आने का दावा किया जा रहा है। लंबे समय से स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और क्षेत्रीय मंचों द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों के बीच पहाड़ी आर्मी और कत्यूरी समाज से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इसे जनहित की लड़ाई बताते हुए कहा है कि यह केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा का आंदोलन है।
आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि हालिया घटनाक्रम ने उन प्रयासों को बल दिया है, जिनका उद्देश्य कथित अवैध कब्जों और अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच तथा सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उनका दावा है कि इस घटनाक्रम से उन लोगों की भूमिका भी चर्चा में आई है जिन पर आंदोलनकारियों ने भूमि संबंधी मामलों में प्रभाव डालने या कथित रूप से भू-माफियाओं के हितों को बढ़ावा देने के आरोप लगाए थे। इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है।
हरिश रावत (पहाड़ी आर्मी) की सक्रिय भूमिका
आंदोलन में पहाड़ी आर्मी के प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल हरिश रावत को समर्थक इस अभियान का एक प्रमुख चेहरा बता रहे हैं। आंदोलनकारियों के अनुसार उन्होंने लगातार प्रशासन के समक्ष ज्ञापन दिए, स्थानीय लोगों को संगठित किया और सार्वजनिक मंचों पर कथित भूमि माफिया के विरुद्ध आवाज उठाई।
समर्थकों का कहना है कि हरिश रावत ने कई बार यह मांग उठाई कि यदि किसी भूमि पर अवैध कब्जे, नियमों के उल्लंघन या सार्वजनिक हित से जुड़े प्रश्न हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। उनके अनुसार उत्तराखंड की भूमि को केवल आर्थिक संसाधन नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखा जाना चाहिए।
लोग हरीश रावत जैसे निस्वार्थ समाजसेवियों को नेतृत्व देने की आवश्यकता बता रहे हैं जो अपनी भूमि के संरक्षण के लिए प्रशासन से भिड़ने को तैयार रहते हैं।
कत्यूरी समाज और रमेश सिंह मनराल का अभियान
कत्यूरी समाज की ओर से रमेश सिंह मनराल भी इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे। समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार उन्होंने लंबे समय से विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और राज्य सरकार के समक्ष इस विषय को लगातार उठाया और ध्वस्तीकरण तक डटे रहे। समाज सेवी इंद्र सिंह पटवाल गुसाईं (सकनणा), इतिहास संरक्षक और सोशल मीडिया प्रभारी, राजमाता जियारानी समिति ने बैठकों और जनसंपर्क अभियानों के माध्यम से उन्होंने स्थानीय जनता को जोड़ने का प्रयास किया। महिलाओं ने भी इसमें प्रमुख भूमिका निभाई जिसमें श्रीमती सीता रावत ने इस मुद्दे पर प्रशासन को तत्काल ध्वस्तीकरण कार्रवाई हेतु मांग पत्र सौंपा था।
समाज का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित, धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व वाली भूमि तथा स्थानीय समुदाय के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है।
सामाजिक संगठनों की एकजुटता
इस अभियान में विभिन्न सामाजिक संगठनों, स्थानीय नागरिकों, युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों ने भी भागीदारी की। सोशल मीडिया में देश विदेश से कड़ी प्रतिक्रिया के बाद प्रशासन सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं के दबाव के बावजूद कार्यवाही को मजबूर हुआ है।आंदोलनकारियों का कहना है कि उत्तराखंड में सार्वजनिक भूमि, जल स्रोतों और सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए समाज को लगातार सजग रहने की आवश्यकता है।
पारदर्शी जांच की मांग
आंदोलन से जुड़े संगठनों ने मांग की है कि यदि भूमि से जुड़े किसी भी मामले में अनियमितताओं के आरोप हैं तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि तथ्यों के आधार पर कार्रवाई हो सके और भविष्य में ऐसे विवादों की पुनरावृत्ति न हो।
उत्तराखंड में जनआंदोलनों की परंपरा
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में पर्यावरण, भूमि, जल स्रोतों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े जनआंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे आंदोलनों ने समय-समय पर प्रशासन और सरकार का ध्यान स्थानीय मुद्दों की ओर आकर्षित किया है। इस मामले से सत्ता से जुड़े कई लोग बेनकाब हो गए हैं जिनके नाम सोशल मीडिया में तैर रहे हैं।
आगे की राह
आंदोलनकारी चाहते हैं कि संबंधित भूमि से जुड़े सभी अभिलेखों की जांच हो, यदि कहीं अवैधता पाई जाती है तो कानून के अनुरूप कार्रवाई हो और सार्वजनिक संपत्तियों तथा सांस्कृतिक महत्व के स्थलों की सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक नीति बनाई जाए

