हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख प्रभाव ऊंचाई-निर्भर तापन (Elevation-Dependent Warming – EDW) है, जिसमें ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान वृद्धि की दर तेज हो जाती है। कई अध्ययनों से पता चलता है कि हिमालय और तिब्बती पठार जैसे उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लोबल एवरेज से ज्यादा तेजी से गर्मी बढ़ रही है, खासकर ऊंचे इलाकों में। 1950 से अब तक उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापन ग्लोबल औसत से करीब 50% तेज रहा है। हाल के अध्ययनों (2023-2025) में पुष्टि हुई है कि यह प्रवृत्ति जारी है, और उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में और तेज हो सकती है।
EDW क्या है और हिमालय में इसका पैटर्न
EDW का मतलब है कि तापमान वृद्धि की दर ऊंचाई के साथ व्यवस्थित रूप से बदलती है – आमतौर पर ऊंचे इलाकों में ज्यादा तेज। हिमालय में:
- 4500 मीटर से ऊपर के क्षेत्रों में तापमान वृद्धि सबसे स्पष्ट है।
- केंद्रीय हिमालय में ग्लेशियर और स्नो कवर सिकुड़ रहे हैं, जबकि ऊंचे इलाकों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है।
- तिब्बती पठार पर 4000 मीटर से ऊपर 0.5°C प्रति दशक तक की दर से तापन देखा गया।
- हाल के अध्ययनों (2024-2025) में पुष्टि हुई कि 5000 मीटर तक EDW मजबूत है, लेकिन कुछ मामलों में बहुत ऊंचे (6000 मीटर+) पर स्थिर या कम हो सकता है। सेंट्रल हिमालय में 2000-2020 के डेटा से ऊंचाई के साथ तापमान वृद्धि और स्नो कवर कमी स्पष्ट है।
मुख्य कारण
EDW के पीछे कई भौतिक प्रक्रियाएं जिम्मेदार हैं:
- स्नो-एल्बीडो फीडबैक: बर्फ पिघलने से सतह गहरी हो जाती है, जो ज्यादा सूर्य किरणें अवशोषित करती है, जिससे और तापन होता है।
- एयरोसॉल (ब्लैक कार्बन और डस्ट): प्रदूषक कण बर्फ पर जमा होकर अल्बीडो कम करते हैं और वायुमंडल में गर्मी बढ़ाते हैं।
- जलवाष्प और क्लाउड फीडबैक: ऊंचाई पर नमी और बादल परिवर्तन से लॉन्गवेव रेडिएशन बढ़ता है।
- वायुमंडलीय परिसंचरण: ग्लेशियरों से कटाबैटिक हवाएं कभी लोकल कूलिंग लाती हैं, लेकिन कुल मिलाकर तापन हावी है।
भारतीय संस्थानों की रिपोर्ट्स और अध्ययन
भारतीय संस्थानों ने EDW पर महत्वपूर्ण शोध किया है, जो हिमालय की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं:
- वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG, देहरादून): ग्लेशियोलॉजी और क्लाइमेट चेंज पर प्रमुख शोध। अध्ययनों में ग्लेशियर पिघलने और ऊंचाई पर तापन की दर पर फोकस। उदाहरण: चमोली बाढ़ (2021) जैसे घटनाओं में क्लाइमेट चेंज और EDW की भूमिका। संस्थान ग्लेशियर मॉनिटरिंग और हिमालयी जियोडायनामिक्स पर काम करता है।
- वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII, देहरादून): उच्च हिमालय में तापन के जैव विविधता पर प्रभाव। 2018 अध्ययन में ऊपरी क्षेत्रों में वार्मिंग से पौधे, कीड़े, पक्षी और स्तनधारी प्रजातियों (जैसे स्नो लेपर्ड) पर खतरा बताया। ट्रेलाइन शिफ्ट और स्पीशीज माइग्रेशन पर फोकस।
- आईआईटी और अन्य: IITs के शोधकर्ताओं ने CMIP मॉडल्स से EDW का विश्लेषण किया। उदाहरण: इंडियन हिमालयन रीजन में ऊंचाई पर तापमान और वर्षा ट्रेंड्स। 2022-2024 अध्ययनों में ऊंचाई पर तेज वार्मिंग और क्रायोस्फियर प्रभाव।
- जी.बी. पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट (GBPIHED): ट्रेलाइन एनवायरनमेंट में शैलो टेम्परेचर लैप्स रेट और EDW। अध्ययनों में ऊंचाई पर तेज वार्मिंग से ट्रीलाइन ऊपर शिफ्ट और वेजिटेशन चेंज। उच्च ऊंचाई ट्रांजिशन जोन्स में मॉनिटरिंग।
- ICIMOD (इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट): हिंदू कुश हिमालय असेसमेंट रिपोर्ट (2019, 2023) में EDW की पुष्टि – उच्च ऊंचाई पर तेज वार्मिंग, ग्लेशियर लॉस 65% तेज। 1.5°C वार्मिंग भी HKH के लिए खतरनाक।
ये संस्थान सैटेलाइट डेटा, फील्ड ऑब्जर्वेशन और मॉडलिंग से EDW की पुष्टि करते हैं, जो स्नो-आइस फीडबैक से驱动ित है।
वर्तमान स्थिति: पहाड़ों में कम बर्फबारी, कोई वर्षा नहीं और बदलते पैटर्न
2025 के दिसंबर में उत्तराखंड और हिमालय के कई हिस्सों में अब तक सामान्य बर्फबारी नहीं हुई है। केदारनाथ से औली तक के चोटियां बर्फ रहित हैं, जिसे ‘स्नो फेमिन’ कहा जा रहा है। कमजोर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस और जलवायु परिवर्तन के कारण यह सूखा सर्दी का मौसम है। हालांकि, 31 दिसंबर से 2 जनवरी तक ऊपरी इलाकों में बर्फबारी की संभावना है, लेकिन दिसंबर तक की कमी चिंताजनक है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 2025 तीसरा लगातार कम स्नो पर्सिस्टेंस वाला साल रहा, जो 23 साल का रिकॉर्ड लो है।
यह कितना खतरनाक है: लोगों के लिए प्रभाव
अब तक कोई बर्फबारी न होना बेहद खतरनाक है:
- प्रदूषण का ठहराव: वर्षा या बर्फबारी न होने से हवा में प्रदूषक ठहर जाते हैं, AQI बढ़ता है और स्मॉग बनता है। घाटियों में कोहरा घना हो जाता है।
- गर्मियों में जल संकट: बर्फबारी कम होने से ग्लेशियर रिचार्ज नहीं होते, नदियां और स्प्रिंग्स सूखते हैं। गर्मियों में पानी की भारी कमी, कृषि प्रभावित, पेयजल संकट।
- अन्य प्रभाव: पर्यटन को नुकसान, कृषि में फसलें प्रभावित, जंगल की आग का खतरा बढ़ना। दक्षिण एशिया के 2 अरब लोग हिमालयी जल पर निर्भर हैं – पहले बाढ़, बाद में सूखा।
वृक्षारोपण और पेड़ों तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा क्यों अनिवार्य है
जलवायु परिवर्तन और EDW के बढ़ते प्रभावों के बीच वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों (पेड़, जंगल, जल स्रोत) की बचत अब जीवन-मरण का सवाल बन गई है। मुख्य कारण:
- कार्बन सिंक के रूप में: पेड़ CO₂ अवशोषित करते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है। हिमालय में डिफॉरेस्टेशन से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और EDW तेज होता है।
- मिट्टी और जल संरक्षण: पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधती हैं, लैंडस्लाइड और बाढ़ रोकती हैं। बिना पेड़ों के वर्षा कम होने पर जल स्रोत सूख जाते हैं।
- जैव विविधता और इकोसिस्टम: जंगल ठंडक प्रदान करते हैं, वन्यजीवों का घर हैं और स्नो-एल्बीडो फीडबैक को संतुलित करते हैं।
- स्थानीय जलवायु नियंत्रण: वृक्षारोपण से लोकल ठंडक बढ़ती है, वर्षा चक्र सुधारता है और प्रदूषण कम होता है।
- मानव जीवन के लिए: उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में पेड़ कटाई से स्प्रिंग्स सूख रहे हैं, जिससे हजारों गांव पानी के संकट में। वृक्षारोपण से गर्मियों का जल संकट रोका जा सकता है।
बिना तत्काल बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और डिफॉरेस्टेशन रोक के EDW के प्रभाव और घातक हो जाएंगे – अधिक बाढ़, सूखा, प्रदूषण और खाद्य संकट।
क्या किया जा सकता है और गंभीरता क्यों जरूरी
यह EDW और जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव है, इसलिए गंभीरता से लेना जरूरी:
- उत्सर्जन कम करना: ग्लोबल स्तर पर कार्बन उत्सर्जन घटाना, भारत में रिन्यूएबल एनर्जी बढ़ाना।
- मॉनिटरिंग और अनुकूलन: WIHG, ICIMOD जैसे संस्थानों की मॉनिटरिंग बढ़ाना, स्प्रिंग रिवाइवल, रेनवाटर हार्वेस्टिंग।
- वन संरक्षण और वृक्षारोपण: सख्त कानून से पेड़ कटाई रोकना, कम्युनिटी-बेस्ड प्लांटेशन ड्राइव।
- नीति स्तर: जल संरक्षण योजनाएं, कृषि में ड्रिप इरिगेशन, जागरूकता।
गंभीर न होने पर जल सुरक्षा, कृषि और जैव विविधता खतरे में पड़ जाएगी। तत्काल कार्रवाई से ही इस संकट को रोका जा सकता है।
प्रभाव और परिणाम
- ग्लेशियर पिघलना: हिमालय के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं, जिससे ग्लेशियल झीलें बढ़ रही हैं और बाढ़ का खतरा।
- जल संसाधन: 1 अरब से ज्यादा लोग हिमालयी नदियों पर निर्भर हैं; पिघलने से पहले बाढ़, बाद में सूखा।
- वनस्पति और जैव विविधता: ऊंचे इलाकों में ग्रीनिंग बढ़ रही है, लेकिन निचले में हीट स्ट्रेस। स्पीशीज माइग्रेशन और विलुप्ति का खतरा।
- मानव जीवन: दक्षिण एशिया में पानी की कमी, कृषि प्रभावित।
आगे की संभावनाएं
मॉडल प्रोजेक्शन (CMIP5 और हाल के) बताते हैं कि 21वीं सदी में EDW और तेज होगा, खासकर उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियर कूलिंग प्रभाव से लोकल ठंडक भी संभव है।
यह घटना हिमालय को जलवायु परिवर्तन का ‘हॉटस्पॉट’ बनाती है। उत्सर्जन कम करना, मॉनिटरिंग बढ़ाना (जैसे WIHG, WII, GBPIHED द्वारा) और अनुकूलन रणनीतियां जरूरी हैं ताकि इस संवेदनशील क्षेत्र की रक्षा हो सके। भारतीय संस्थानों के शोध से नीति निर्माण में मदद मिल रही है।

