
नई दिल्ली, 25 मार्च 2026: चीन ने भारतीय गैर-बासमती चावल के तीन शिपमेंट्स को वापस कर दिया है। इनमें आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव (जीएमओ) की मौजूदगी का आरोप लगाया गया है। यह घटना व्यापार वार्ताओं में रणनीतिक दबाव का संकेत दे रही है। उल्लेखनीय बात यह है कि ये शिपमेंट्स चीन की एक सरकारी एजेंसी द्वारा निर्यात से पहले जांचे और प्रमाणित किए जा चुके थे, फिर भी चीनी कस्टम्स ने इन्हें अस्वीकार कर दिया।
भारतीय निर्यातकों ने इस मामले को कृषि निर्यात संवर्धन एजेंसी (एपीईडीए) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के समक्ष उठाया है। निर्यातक अब आईसीएआर से आधिकारिक घोषणा चाहते हैं कि भारत में उगाया गया चावल पूरी तरह गैर-जीएमओ है। चीन के खरीदार भी ऐसी गारंटी की मांग कर रहे हैं।
भारत में जीएम फसलों की वर्तमान स्थिति
भारत में अभी तक किसी भी जीएम खाद्य फसल की व्यावसायिक खेती की अनुमति नहीं है। केवल बीटी कपास (Bt Cotton) ही एकमात्र जीएम फसल है, जिसे वर्ष 2002 से व्यावसायिक रूप से उगाने की अनुमति दी गई है। चावल, गेहूं, सरसों या अन्य खाद्य फसलों में जीएम किस्मों की व्यावसायिक खेती पूरी तरह प्रतिबंधित है।
जीएम सरसों (डीएमएच-11) का पर्यावरणीय रिलीज 2022 में मंजूर हुआ था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है और व्यावसायिक उत्पादन अभी शुरू नहीं हुआ है। देश में केवल गैर-जीएमओ धान की खेती होती है। जीनोम एडिटेड फसलों (जैसे सीआरआईएसपीआर तकनीक) पर नियमों को कुछ हद तक आसान बनाया गया है, लेकिन पारंपरिक जीएमओ से ये अलग हैं।
जीएम फसलों पर भारत के नियम और नियमन
भारत में जीएम फसलों का नियमन जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी (जीईएसी) के अधीन है, जो पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है। नियम पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत बनाए गए हैं। किसी भी जीएम फसल को व्यावसायिक खेती के लिए बहु-स्थान फील्ड ट्रायल, बायोसेफ्टी मूल्यांकन, सार्वजनिक परामर्श और राज्य सरकारों की सहमति जरूरी है। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) भी जीएम खाद्य पदार्थों पर सख्त नियम रखता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को जीएम फसलों पर राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश दिया है, लेकिन अभी कोई स्पष्ट नीति लागू नहीं हुई है।
क्या जीएम फसलों की अनुमति है?
नहीं, खाद्य फसलों के लिए नहीं। केवल बीटी कपास की अनुमति है। जीएम खाद्य फसलों पर या तो अनिश्चितकालीन रोक है या न्यायिक प्रक्रिया चल रही है।
अन्य भारतीय फसलों को अन्य देशों द्वारा अस्वीकार किए जाने के उदाहरण
- यूरोपीय संघ (ईयू) में भारतीय चावल या चावल उत्पादों में जीएम संदूषण की शिकायतें पहले भी आई हैं (2021 में लगभग 500 टन चावल आटा प्रभावित)।
- कुछ देशों ने भारतीय निर्यातों में जीएम संदूषण का हवाला दिया है, हालांकि भारत मुख्य रूप से गैर-जीएमओ उत्पाद निर्यात करता है।
- चीन खुद जीएम चावल उगाता है, फिर भी भारत से सख्ती बरत रहा है।
जीएम फसलों के स्वास्थ्य प्रभाव: वैज्ञानिक सहमति
जीएम फसलों के स्वास्थ्य प्रभाव पर लंबे समय से बहस चल रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), अमेरिकी एफडीए, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज और हालिया अध्ययनों (2025-2026) के अनुसार, बाजार में उपलब्ध जीएम खाद्य पदार्थ पारंपरिक फसलों जितने ही सुरक्षित हैं।
- तीन दशकों से जीएम फसलों का उपयोग हो रहा है। अब तक कैंसर, एलर्जी, प्रजनन संबंधी समस्याएं या अन्य गंभीर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
- पशु अध्ययनों और महामारी विज्ञान डेटा में कोई सुसंगत नुकसान नहीं दिखा। पोषण मूल्य समान पाया गया।
- कुछ पुरानी चिंताएं (टॉक्सिसिटी, जीन ट्रांसफर, हर्बिसाइड से संबंधित जोखिम) उठी थीं, लेकिन बड़े पैमाने की समीक्षाओं में इन्हें असमर्थित या अध्ययन की कमियों से जोड़ा गया।
- हर्बिसाइड-टॉलरेंट फसलों पर केमिकल स्प्रे बढ़ने से अलग जोखिम चर्चा में है, लेकिन फसल स्वयं नहीं।
भारत में बीटी कपास से कीटनाशक उपयोग कम हुआ, जो किसानों के स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक माना जाता है। कोई बड़े पैमाने का मानव स्वास्थ्य अध्ययन नुकसान की पुष्टि नहीं करता।
यह घटना भारत-चीन व्यापार संबंधों में नई चुनौती पैदा कर सकती है। भारतीय निर्यातकों को जीएम-मुक्त प्रमाणन प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है। वैज्ञानिक सहमति जीएम फसलों की सुरक्षा का समर्थन करती है, लेकिन लंबे समय के प्रभावों पर अधिक स्वतंत्र शोध की सिफारिश की जाती है।
उपभोक्ता अपनी पसंद से गैर-जीएम विकल्प चुन सकते हैं। सरकार से स्पष्ट नीति और पारदर्शिता की मांग बढ़ रही है। किसान और निर्यातक संगठन आधिकारिक स्रोतों से अपडेट लेते रहें।
यह मुद्दा भारत की खाद्य सुरक्षा, निर्यात और कृषि नीति को प्रभावित करता है।
