अवैध खनन, भंडारण और परिवहन पर लगातार कार्रवाई से सरकारी राजस्व में बड़ा इजाफा; अगस्त 2025 से अगस्त 2026 तक कार्रवाई का असर दिखने का दावा
देहरादून/विकासनगर।
खनन क्षेत्र में अवैध गतिविधियों पर सख्ती किस तरह सरकारी राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ माफिया तंत्र पर दबाव बना सकती है, इसका एक उदाहरण देहरादून जनपद के खनन क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। उपलब्ध जानकारी और पिछले एक वर्ष के कार्रवाई संबंधी विवरण के आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि अवैध खनन, अवैध भंडारण और अवैध परिवहन के खिलाफ की गई सख्त कार्रवाई से अगस्त 2025 से अगस्त 2026 के बीच सरकार के खजाने में खनन पर्यवेक्षक पंकज चंद द्वारा अवैध खनन, परिवहन और भंडारण पर की गई कार्रवाई से लगभग ₹2 करोड़ तक का राजस्व पहुंचा चुका है।
यह आंकड़ा विभागीय स्तर पर जारी अंतिम ऑडिटेड आंकड़ा नहीं है, बल्कि उपलब्ध कार्रवाई और राजस्व संबंधी जानकारी के आधार पर किया गया है।
अगस्त 2025 में देहरादून तबादला, उसके बाद बदला कार्रवाई का तरीका
पिछले वर्ष अगस्त माह में सहायक खनिज पर्यवेक्षक पंकज चंद का देहरादून स्थानांतरण हुआ था। इसके बाद देहरादून जिले के विभिन्न क्षेत्रों में अवैध खनन, भंडारण, परिवहन और नियम विरुद्ध खनन गतिविधियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की गई।
उपलब्ध समाचार सामग्री के अनुसार, चंद ने लगभग 11 महीने की तैनाती के दौरान डोईवाला, मसूरी, देहरादून, ऋषिकेश से लेकर विकासनगर तक अवैध खनन और उससे जुड़ी गतिविधियों पर कार्रवाई की।
कार्रवाई का दायरा केवल खनन स्थल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अवैध भंडारण, समतलीकरण, बेसमेंट की खुदाई और खनन सामग्री के अवैध परिवहन जैसे मामलों पर भी निगरानी रखी गई।


दो करोड़ से अधिक राजस्व की वसूली का दावा
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, विभागीय कार्रवाई के परिणामस्वरूप एक करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व वसूल किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
यदि अगस्त 2025 से अगस्त 2026 तक की पूरी अवधि में किए गए चालान, जुर्माने, खनन राजस्व, परिवहन, भंडारण तथा अन्य विभागीय वसूली को जोड़ा जाए तो यह राशि लगभग ₹2 करोड़ के आसपास पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।
‘नो फोन, ओनली एक्शन’ की कार्यशैली बनी चर्चा का विषय
पंकज चंद की कार्यशैली को लेकर स्थानीय स्तर पर सबसे अधिक चर्चा उनकी कथित ‘नो फोन, ओनली एक्शन’ नीति की रही।
उपलब्ध समाचार में उनके हवाले से बताया गया कि कार्रवाई के दौरान वे बाहरी दबाव या सिफारिश की बजाय अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने को प्राथमिकता देते हैं।
खनन जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह रवैया महत्वपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि अवैध खनन का नेटवर्क केवल खनन स्थल तक सीमित नहीं रहता। इसमें खनन, भंडारण, परिवहन और बाजार तक सामग्री पहुंचाने की पूरी श्रृंखला शामिल होती है।

टीम के पहुंचते ही भागने लगे वाहन—कार्रवाई का मनोवैज्ञानिक असर
विकासनगर क्षेत्र से संबंधित कार्रवाई के दौरान ऐसा भी सामने आया कि खनन माफिया कार्रवाई की आशंका में अपने ट्रैक्टर और अन्य वाहनों को लेकर भागने की कोशिश करते थे।
उपलब्ध रिपोर्ट में उल्लेख है कि कुछ वाहन कार्रवाई से बचने के लिए उपन्ती नदी में तक कूद गए, और अब दोबारा गलती की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।
यदि यह स्थिति लगातार बनी है तो यह संकेत है कि विभागीय टीम की नियमित गश्त और कार्रवाई से अवैध खनन से जुड़े लोगों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा।
यही किसी भी प्रवर्तन व्यवस्था की महत्वपूर्ण सफलता होती है—जहां कार्रवाई केवल जुर्माना वसूलने तक सीमित न रहकर अवैध गतिविधि को रोकने का प्रभाव पैदा करे।
अवैध खनन पर सख्ती से दोहरा फायदा
खनन के अवैध कारोबार पर कार्रवाई का सरकार को दोहरा फायदा हो सकता है।
पहला—राजस्व की सुरक्षा।
जो खनिज वैध अनुमति और रॉयल्टी के बिना निकाला या परिवहन किया जाता है, उससे सरकार को राजस्व का नुकसान होता है। अवैध खनन पर जुर्माना और वैध प्रक्रिया के तहत खनन से सरकारी आय बढ़ सकती है।
दूसरा—प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा।
नदियों, नदी तटों और पहाड़ी क्षेत्रों में अनियंत्रित खनन से पर्यावरणीय नुकसान, नदी की धारा में बदलाव, कटाव और बाढ़ जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए खनन विभाग की कार्रवाई को केवल राजस्व वसूली के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं है। यह पर्यावरणीय सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से भी जुड़ा विषय है।

एक अधिकारी की सक्रियता से क्या बदल सकता है?
खनन क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार नियम बनाती है, लेकिन जमीन पर उनका पालन सुनिश्चित करना प्रवर्तन तंत्र की जिम्मेदारी होती है।
यदि कोई अधिकारी नियमित रूप से क्षेत्र में गश्त करता है, शिकायतों पर तत्काल पहुंचता है, वाहनों की जांच करता है और अवैध खनन के मामलों में कार्रवाई करता है, तो इससे पूरे नेटवर्क पर असर पड़ सकता है।
पंकज चंद के मामले में भी उपलब्ध जानकारी यही संकेत देती है कि लगातार फील्ड विजिट और कार्रवाई को प्राथमिकता देने से अवैध खनन गतिविधियों पर दबाव बढ़ा। हालांकि इतने बड़े जुर्माने से बचने को कई बार इनको प्रभावित करने की कोशिश की गई होगी, किंतु उन्होंने बिना अडिग हुवे अपने कर्तव्य को निभाया।
लेकिन असली सफलता केवल जुर्माने में नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठता है—क्या केवल जुर्माना वसूल लेना पर्याप्त है?
खनन पर्यवेक्षक पंकज चंद बताते हैं कि खनन माफिया पर स्थायी रोक लगाने के लिए कार्रवाई की पूरी श्रृंखला को मजबूत करना होगा:
- अवैध खनन स्थल की पहचान
- मशीनों और वाहनों की निगरानी
- खनिज के अवैध भंडारण की जांच
- परिवहन परमिट की डिजिटल जांच
- बार-बार उल्लंघन करने वालों पर कठोर कार्रवाई
- राजस्व और चालान का डिजिटल रिकॉर्ड
- नदी क्षेत्रों की नियमित निगरानी
- विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही
- पुलिस, प्रशासन और खनन विभाग के बीच बेहतर समन्वय
- ईमानदार अधिकारीयो को महत्व, और संसाधन युक्त बनाना और उनका संरक्षण सुनिश्चित करना
पंकज चंद द्वारा अवैध खनन, परिवहन और भंडारण पर ₹2 करोड़ की पेनल्टी से बड़ा संदेश
यह बताता है कि प्रवर्तन में सक्रियता बढ़ने पर सरकारी संसाधनों की चोरी को रोकना संभव है और कार्मिक ईमानदारी से राजकीय सेवा करें। बेखौफ अवैध खनन उत्खनन करने वाले अब भारी कार्यवाही के डर से स्वयं ही नियमानुसार चल रहे हैं।
अब जरूरत है ‘एक्शन’ को सिस्टम बनाने की
खनन पर्यवेक्षक पंकज चंद की कार्यशैली से जुड़ी चर्चा का सबसे बड़ा सबक यही है कि किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत सक्रियता महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन अवैध खनन रोकने के लिए व्यवस्था को व्यक्ति-निर्भर नहीं बल्कि सिस्टम-निर्भर बनाना होगा।
यदि इसी तरह की नियमित निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग, अचानक निरीक्षण और पारदर्शी राजस्व रिकॉर्ड की व्यवस्था पूरे उत्तराखंड में लागू हो, तो इससे न केवल सरकारी राजस्व में वृद्धि हो सकती है बल्कि नदियों और पहाड़ों को होने वाला नुकसान भी कम किया जा सकता है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर लगभग ₹2 करोड़ के आसपास राजस्व पहुंचने का अनुमान इस कार्रवाई के आर्थिक प्रभाव को रेखांकित करता है और यह संदेश भी देता है कि पंकज चंद जैसे ईमानदार अधिकारी अगर उत्तराखंड को और मिलेंगे तो अवश्य ही राज्य प्रगतिशील रहेगा और हमारे संसाधन भी दोहन से बचेंगे।

