देहरादून, 19 जनवरी 2026 — उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में तेजी से बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करने के लिए प्रस्तावित रिस्पना-बिंदाल एलिवेटेड कॉरिडोर (RBEC) परियोजना को नई गति मिली है। मुख्य सचिव ने हाल ही में उत्तराखंड मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (यूकेएमआरसी) की बैठक में इस 26 किलोमीटर लंबे चार लेन एलिवेटेड कॉरिडोर को सैद्धांतिक/प्रारंभिक मंजूरी प्रदान की है। यह परियोजना शहर के दो प्रमुख नदियों — रिस्पना और बिंदाल — के तल पर बनाई जाएगी, जिससे मसूरी जाने वाले रूट सहित स्थानीय और पर्यटक यातायात में सुधार की उम्मीद है।
परियोजना की मुख्य विशेषताएं:
- कुल लंबाई: लगभग 26 किलोमीटर (रिस्पना नदी पर ~11 किमी, बिंदाल नदी पर ~15 किमी)।
- आरंभ और समाप्ति: रिस्पना सेतु के पास से शुरू होकर नागल ब्रिज तक, और राजपुर रोड (साईं मंदिर क्षेत्र) तक।
- चौड़ाई: मुख्य कॉरिडोर 20.2 मीटर + शोल्डर 6.5 मीटर।
- उद्देश्य: दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे से बेहतर कनेक्टिविटी, ट्रैफिक जाम में कमी, और इलेक्ट्रिक बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (E-BRTS) के लिए समर्पित लेन।
- अनुमानित लागत: ₹6,200 करोड़ (कुछ रिपोर्ट्स में इससे अधिक का अनुमान)।
- अन्य कार्य: यूटिलिटी शिफ्टिंग (बिजली, हाई टेंशन, सीवर लाइनें), रिटेनिंग वॉल, बाढ़ सुरक्षा उपाय, और छह इंटरचेंज।
सरकार का दावा है कि यह परियोजना बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के प्रभाव से उत्पन्न ट्रैफिक समस्या का स्थायी समाधान होगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने फरवरी 2025 में ही जल्द काम शुरू करने के निर्देश दिए थे, और दिसंबर 2025 में कैबिनेट ने GST तथा रॉयल्टी में छूट देकर प्रोजेक्ट को तेज करने का फैसला किया। भूमि सत्यापन और अधिग्रहण पर काम चल रहा है।
हालांकि, यह परियोजना पर्यावरणविदों, स्थानीय निवासियों और विशेषज्ञों के बीच गहरा विवाद का विषय बनी हुई है। जनवरी 2026 में ही शहरी गतिशीलता विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि एलिवेटेड रोड ट्रैफिक समस्या का समाधान नहीं बनेगी, बल्कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती है, भूकंप जोखिम (हिमालय क्षेत्र में) को और गंभीर बना सकती है, और शहर की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाएगी।
देहरादून सिटिजन्स फोरम (DCF) और 146+ निवासियों ने दिसंबर 2025 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखकर परियोजना रद्द करने की मांग की है। प्रमुख चिंताएं:
- कम से कम 3,400 पेड़ कटेंगे।
- 2,600+ घर प्रभावित/ध्वस्त होंगे।
- नदियों का “मृत्यु” (death of rivers) और ग्राउंडवाटर रिचार्ज पर असर।
- बेहतर विकल्प: मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पैदल यातायात सुविधा और ट्रैफिक मैनेजमेंट।
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अगस्त 2025 में पब्लिक हियरिंग दोबारा कराने का आदेश दिया था, और मामला अभी भी विचाराधीन है। सरकार विकास की आवश्यकता बताते हुए आगे बढ़ रही है, लेकिन पारदर्शिता और पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन की कमी पर सवाल उठ रहे हैं।
परियोजना की प्रगति पर नजर रखी जा रही है। यदि निर्माण शुरू होता है या कोई नया अपडेट आता है, तो यह देहरादून के यातायात और पर्यावरण के भविष्य को तय करेगा।

