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देवभूमि के लोग | विशेष रिपोर्ट

उत्तराखंड में बदलती ग्रामीण तस्वीर: क्या खेती और पशुपालन छोड़कर खाद्य सुरक्षा से समझौता कर रहा है पहाड़?

देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, चारधाम यात्रा और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। इस राज्य की असली ताकत सदियों से उसकी आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था रही है। गांवों में खेती, पशुपालन, स्थानीय अनाज, जैविक खाद और सामुदायिक श्रम जीवन का आधार थे। लगभग हर घर में गाय या भैंस होती थी, खेतों में मंडुवा, झंगोरा, गेहूं, धान, दालें और मौसमी सब्जियां उगाई जाती थीं। दूध, दही, घी और सब्जियां घर से ही उपलब्ध होती थीं और बाजार पर निर्भरता सीमित थी।

लेकिन पिछले दो दशकों में उत्तराखंड का ग्रामीण परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अनेक गांवों में खेत खाली पड़े हैं, पशुशालाएं सूनी हो चुकी हैं और नई पीढ़ी खेती तथा पशुपालन से दूरी बना रही है। इसका परिणाम केवल कृषि उत्पादन में कमी नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और सामाजिक संरचना पर भी दिखाई देने लगा है।

घटती कृषि भूमि: एक गंभीर संकेत

राज्य गठन के बाद उत्तराखंड ने शिक्षा, सड़क, पर्यटन और शहरीकरण के क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन कृषि क्षेत्र कई चुनौतियों से जूझ रहा है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य गठन के बाद कृषि भूमि में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। कई स्थानों पर पहले जो खेत उत्पादन देते थे, वे अब परती पड़े हैं या अन्य उपयोगों में बदल गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि भूमि का कम उपयोग केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा का भी प्रश्न है। पहाड़ में खेती घटने का अर्थ है स्थानीय उत्पादन का कम होना और आवश्यक खाद्य सामग्री के लिए बाहरी बाजार पर अधिक निर्भरता।

खेती छोड़ने के प्रमुख कारण

उत्तराखंड में खेती छोड़ने के पीछे कई परस्पर जुड़े कारण हैं।

सबसे बड़ा कारण है पलायन। रोजगार, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में बड़ी संख्या में युवा शहरों की ओर जा रहे हैं। गांवों में अक्सर केवल बुजुर्ग और महिलाएं रह जाती हैं, जिनके लिए कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में खेती जारी रखना आसान नहीं होता।

दूसरा बड़ा कारण है जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान। बंदर, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीव अनेक क्षेत्रों में किसानों की मेहनत को कुछ ही दिनों में नष्ट कर देते हैं। कई किसानों का कहना है कि लागत निकालना भी कठिन हो जाता है।

इसके अलावा छोटी जोतें, सिंचाई की सीमित व्यवस्था, परिवहन की कठिनाई, बढ़ती लागत और उत्पाद का उचित मूल्य न मिलना भी खेती को कम लाभकारी बनाता है।

पशुपालन से बढ़ती दूरी

एक समय था जब पहाड़ में पशुपालन हर परिवार का हिस्सा था। गाय और भैंस केवल दूध का स्रोत नहीं थीं, बल्कि खेती की रीढ़ थीं। गोबर से जैविक खाद बनती थी, खेतों की उर्वरता बनी रहती थी और अतिरिक्त दूध परिवार की आय बढ़ाता था।

आज अनेक गांवों में पशुपालन कम होता दिखाई देता है। इसके पीछे श्रम की कमी, चारे की समस्या, चरागाहों का घटता क्षेत्र, पशु चिकित्सा सुविधाओं की सीमित उपलब्धता और कम आर्थिक लाभ जैसे कारण बताए जाते हैं।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उत्तराखंड में अभी भी हजारों किसान सफलतापूर्वक दुग्ध उत्पादन और पशुपालन कर रहे हैं। इसलिए पूरे राज्य के लिए यह कहना सही नहीं होगा कि पशुपालन समाप्त हो गया है। लेकिन अनेक क्षेत्रों में इसकी पारंपरिक व्यापकता अवश्य कम हुई है।

बाजार पर बढ़ती निर्भरता

खेती और पशुपालन घटने का सबसे बड़ा प्रभाव भोजन की व्यवस्था पर पड़ता है। पहले जो परिवार अपना दूध, दही, सब्जियां और अनाज स्वयं पैदा करते थे, वे अब बाजार से अधिक खरीदारी करने लगे हैं।

बाजार आधारित व्यवस्था सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन इससे परिवार मूल्य वृद्धि, आपूर्ति में बाधा और गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

खाद्य मिलावट और गुणवत्ता का प्रश्न

यह कहना सही नहीं होगा कि बाजार में उपलब्ध हर खाद्य पदार्थ मिलावटी होता है। भारत में लाखों खाद्य उत्पाद सुरक्षित और मानकों के अनुरूप बिकते हैं। फिर भी समय-समय पर खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें कुछ नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरते।

इसी कारण विशेषज्ञ स्थानीय स्तर पर सुरक्षित उत्पादन, गुणवत्ता जांच और उपभोक्ता जागरूकता को महत्वपूर्ण मानते हैं। यदि स्थानीय स्तर पर दूध, सब्जियां और अनाज का उत्पादन बढ़े तो ग्रामीण परिवारों की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत हो सकती है।

स्वास्थ्य और पोषण पर प्रभाव

जब स्थानीय ताजा भोजन की जगह अधिक प्रसंस्कृत या दूर-दराज से आने वाले खाद्य पदार्थों का उपयोग बढ़ता है, तो पोषण की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। हालांकि किसी भी बीमारी का कारण केवल खाद्य मिलावट या बाजार आधारित भोजन को मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। स्वास्थ्य अनेक कारकों—आहार, जीवनशैली, आनुवंशिकता, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं—से प्रभावित होता है।

फिर भी पोषण विशेषज्ञ स्थानीय, ताजा और संतुलित भोजन को बेहतर स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

ग्रामीण संस्कृति पर प्रभाव

खेती और पशुपालन उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहे हैं। हरेला, फूलदेई और अन्य पर्व प्रकृति और कृषि चक्र से जुड़े हैं। यदि खेती कम होती है, तो इन परंपराओं का सामाजिक आधार भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।

पारंपरिक बीज, स्थानीय अनाज, सामूहिक श्रम और ग्रामीण सहयोग की व्यवस्था भी समय के साथ प्रभावित होती है।

पर्यावरणीय प्रभाव

खाली पड़े खेतों में झाड़ियां बढ़ती हैं, जिससे कुछ क्षेत्रों में वनाग्नि का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं पशुपालन कम होने से जैविक खाद का उपयोग भी घटता है और खेती का पारंपरिक चक्र प्रभावित होता है।

स्थानीय कृषि जैव विविधता का संरक्षण भी चुनौती बन जाता है।

सरकार की भूमिका और योजनाएं

उत्तराखंड सरकार प्राकृतिक खेती, जैविक कृषि, बागवानी, दुग्ध विकास, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देने जैसी अनेक योजनाएं चला रही है। इनका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और कृषि को लाभकारी बनाना है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है। उनका प्रभाव गांव तक पहुंचना, बाजार उपलब्ध कराना, प्रशिक्षण देना और किसानों का विश्वास जीतना भी उतना ही आवश्यक है।

क्या हो सकते हैं समाधान?

उत्तराखंड की कृषि और पशुपालन को पुनर्जीवित करने के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है।

  • जंगली जानवरों से फसल सुरक्षा के प्रभावी उपाय।
  • छोटे किसानों के लिए आधुनिक तकनीक और मशीनरी की उपलब्धता।
  • दुग्ध सहकारी समितियों को मजबूत करना।
  • स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग और बेहतर विपणन।
  • प्राकृतिक और जैविक खेती को प्रोत्साहन।
  • गांव स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना।
  • युवाओं के लिए कृषि आधारित स्टार्टअप और उद्यमिता को बढ़ावा।
  • पशु चिकित्सा सेवाओं और चारा विकास में सुधार।
  • विद्यालयों और कॉलेजों में कृषि एवं ग्रामीण उद्यमिता पर व्यावहारिक शिक्षा।

युवाओं की भूमिका

आज की पीढ़ी यदि आधुनिक तकनीक, डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स, एग्री-टेक और मूल्य संवर्धन के साथ खेती को जोड़े, तो कृषि फिर से लाभकारी व्यवसाय बन सकती है। उत्तराखंड के स्थानीय उत्पाद—मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, लाल चावल, शहद और जड़ी-बूटियां—राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर पहचान बना सकते हैं।

संपादकीय विश्लेषण

उत्तराखंड के सामने चुनौती केवल खेती बचाने की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की है। विकास और शहरीकरण आवश्यक हैं, लेकिन यदि गांव खाली होते गए, खेती घटती गई और पशुपालन कमजोर पड़ता गया, तो राज्य को खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि इस विषय पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए। उत्तराखंड में आज भी हजारों किसान कठिन परिस्थितियों में खेती और पशुपालन कर रहे हैं। अनेक स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन और युवा उद्यमी स्थानीय कृषि को नए अवसरों से जोड़ रहे हैं। इसलिए आवश्यकता निराशा की नहीं, बल्कि ऐसी नीतियों और प्रयासों की है जो कृषि को सम्मानजनक और लाभकारी आजीविका बना सकें।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरी का समावेश जरूरी

उत्तराखंड की पहचान उसके गांव, खेत, जंगल और पशुधन से जुड़ी रही है। यदि खेती और पशुपालन को आधुनिक तकनीक, उचित बाजार, बेहतर मूल्य और मजबूत सरकारी सहयोग के साथ पुनर्जीवित किया जाए, तो राज्य न केवल अपनी खाद्य सुरक्षा को मजबूत कर सकता है बल्कि रोजगार, पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास का एक नया मॉडल भी प्रस्तुत कर सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और परंपरा के बीच संतुलन बनाया जाए। आत्मनिर्भर गांव केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति भी बन सकते हैं।

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