पिथौरागढ़, 25अप्रैल 2026 | विशेष रिपोर्ट/ पिथौरागढ़ की सिविल जज (सी०डि०)/न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 09 अप्रैल 2026 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए थाना जाजरदेवल के चर्चित स्टॉकिंग मामले में अभियुक्त पंकज चन्द को भारतीय दंड संहिता की धारा 354डी के आरोप से पूर्ण रूप से दोषमुक्त कर दिया। यह मामला सिर्फ एक बरी का आदेश नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में पुलिस विवेचना की गुणवत्ता, तकनीकी साक्ष्यों की अनिवार्यता और “संदेह से परे प्रमाण” के कानूनी सिद्धांत पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
आइए पूरे केस पर नजर डालते हैं—
1. मामले की पृष्ठभूमि: जमानत पर बाहर आने के बाद का आरोप
इस केस की जड़ें एक पुराने मामले से जुड़ी हैं। निर्णय के पेज 2/12 के पैरा 4 के अनुसार, वादिनी/पीड़िता ने अभियुक्त पंकज चन्द के खिलाफ पहले मु०अ०सं० 60/21 धारा 376, 506 भा०दं०सं० में मुकदमा दर्ज कराया था।
अभियोजन का कथन था कि अभियुक्त जब उस गंभीर मामले में जमानत पर बाहर आया, तो उसने 26 मार्च 2022 से पहले विभिन्न तारीखों और समय पर पीड़िता को फिर से परेशान करना शुरू कर दिया। आरोप पत्र के अनुसार, अभियुक्त ने पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध उससे व्यक्तिगत संपर्क बढ़ाने की नीयत से फोन किए और व्हाट्सएप पर अभद्र मैसेज भेजकर बार-बार संपर्क करने का प्रयास किया।
तहरीर में यह भी कहा गया कि अभियुक्त वादिनी के परिवार वालों व दोस्तों को भी अभद्र मैसेज कर परेशान कर रहा था, जिससे वादिनी और उसका परिवार मानसिक रूप से काफी परेशान था। इसके अलावा, पूर्व में भी पंकज चन्द द्वारा फेसबुक के माध्यम से वादिनी को परेशान किए जाने का आरोप लगाया गया था।
इन्हीं आरोपों के आधार पर थाना जाजरदेवल, जिला पिथौरागढ़ में नया फौजदारी वाद संख्या-19/2024, पुराना फौजदारी वाद संख्या-279/2024 दर्ज कर धारा 354डी भा०दं०सं० के तहत विवेचना शुरू हुई और आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
2. न्यायिक प्रक्रिया: आरोप तय होने से बहस तक का सफर
आरोप विरचन: पेज 3/12 के पैरा 5 के अनुसार, धारा 207 द०प्र०सं० के तहत अभियोजन प्रपत्रों की नकलें अभियुक्त को देने के बाद, न्यायालय ने पंकज चन्द के खिलाफ भा०दं०सं० की धारा 354डी के तहत आरोप विरचित किया। अभियुक्त ने आरोपों से साफ इंकार किया और विचारण की मांग की।
अभियोजन साक्ष्य: अपने केस को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कुल 7 मौखिक गवाह पेश किए:
- PW-1 पीड़िता/वादिनी: मुख्य गवाह
- PW-2 वर्षा: समर्थन गवाह
- PW-3 का० अंकिता: पुलिस कर्मी
- PW-4 सुनील: समर्थन गवाह
- PW-5 निरीक्षक प्रभात कुमार: पहले विवेचक
- PW-6 उपनिरीक्षक मेघा शर्मा: दूसरी विवेचक
- PW-7 उपनिरीक्षक मनोज पाण्डे: तीसरे विवेचक
दस्तावेजी साक्ष्य: अभियोजन ने 9 दस्तावेज प्रदर्श के रूप में दाखिल किए, जिनमें मुख्य थे:
- तहरीर प्रदर्श पी-1
- पीड़िता का धारा 164 द०प्र०सं० का बयान प्रदर्श पी-2
- चिकित्सा एफ0आई0आर0 प्रदर्श पी-3
- सामान्य दैनिकी विवरण प्रदर्श पी-4
- नकल रपट संख्या 12 दिनांक 01.04.2022 प्रदर्श पी-5
- आरोप पत्र प्रदर्श पी-8
3. अभियुक्त का पक्ष: “मैं निर्दोष हूं, मुझे झूठा फंसाया गया”
पेज 3/12 के पैरा 6 में दर्ज है कि अभियोजन साक्ष्य समाप्त होने पर न्यायालय ने द०प्र०सं० की धारा-313 के तहत अभियुक्त पंकज चन्द का बयान दर्ज किया। इस कानूनी प्रक्रिया में अभियुक्त को अभियोजन के सारे आरोपों से अवगत कराकर उसका जवाब मांगा जाता है।
इस बयान में पंकज चन्द ने अभियोजन कथानक से पूर्णतः इंकार करते हुए स्पष्ट कहा: “मैं निर्दोष हूं। मुझे इस मामले में झूठा फंसाया गया है।” अभियुक्त ने अपने बचाव में कोई सफाई साक्ष्य प्रस्तुत करने से भी इंकार कर दिया। इसका अर्थ है कि बचाव पक्ष की रणनीति यही थी कि अभियोजन अपने केस को साबित ही नहीं कर पाएगा, इसलिए बचाव साक्ष्य की जरूरत नहीं।
4. बहस का केंद्र: क्या थे दोनों पक्षों के मुख्य तर्क
पैरा 8 में दोनों पक्षों की बहस दर्ज है:
सहायक अभियोजन अधिकारी का तर्क: उन्होंने कहा कि वादिनी ने अपने बयान में अभियुक्त द्वारा परेशान किए जाने की पुष्टि की है। अन्य गवाहों के बयान और पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि अभियुक्त ने 26.03.2022 से पूर्व विभिन्न तारीखों पर पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध फोन और व्हाट्सएप पर अभद्र मैसेज कर बार-बार संपर्क का प्रयास किया। इसलिए अभियुक्त को दंडित किया जाए।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता का तर्क: अभियुक्त के वकील ने 4 बिंदुओं पर जोर दिया:
- अभियुक्त निर्दोष है और उसे झूठा फंसाया गया है।
- जिन मोबाइल नंबरों से फोन/मैसेज का आरोप है, वे मोबाइल नंबर अभियुक्त के नाम पर पंजीकृत नहीं हैं।
- अभियुक्त ने पीड़िता से फोन/व्हाट्सएप से संपर्क का प्रयास नहीं किया।
- अभियोजन केस साबित नहीं कर सका।
यहीं से केस का रुख बदलना शुरू हुआ, क्योंकि कोर्ट को अब इन तर्कों का साक्ष्यों से मिलान करना था।
5. फैसला पलटने वाला पहला झटका: फेसबुक का “शून्य सबूत” – पेज 8/12 का विश्लेषण
कोर्ट ने पैरा 14 में फेसबुक से संबंधित आरोपों की विस्तार से जांच की। यह हिस्सा अभियोजन के लिए सबसे घातक साबित हुआ।
कोर्ट के सवाल, जिनका जवाब अभियोजन नहीं दे सका:
- अभियोजन यह नहीं बता सका कि अभिकथित फेसबुक पोस्ट किस स्थान से अपलोड की गई।
- यह स्पष्ट नहीं हुआ कि पोस्ट किस इलेक्ट्रॉनिक यंत्र – कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल – से की गई।
- उस यंत्र का IMEI नंबर या MAC Address क्या था, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई।
- पोस्ट किस तिथि व समय पर अपलोड हुई, यह भी नहीं बताया गया।
- सबसे महत्वपूर्ण – पोस्ट से संबंधित विशिष्ट आईपी एड्रेस होने का कोई प्रमाण पत्रावली पर प्रस्तुत नहीं किया गया।
फेसबुक से डेटा क्यों नहीं लिया गया:
कोर्ट ने नोट किया कि फेसबुक के भारत में कार्यालय हैं और अनुरोध करने पर वे कानून के तहत जानकारी देने के लिए बाध्य हैं। लेकिन “इस मामले में प्रासंगिक जानकारी एकत्र करने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया।” लॉगिन हिस्ट्री, चैट लॉग, कनवरसेशन आदि भी पेश नहीं किए गए।
एकाउंट का स्वामित्व भी साबित नहीं:
अभिकथित फेसबुक एकाउंट के किसी फॉलोवर का बयान तक दर्ज नहीं किया गया, जिससे यह साबित होता कि वह एकाउंट वास्तव में पंकज चन्द ही चला रहा था।
6. दूसरा बड़ा झटका: 7 मोबाइल नंबर, पर एक भी अभियुक्त का नहीं – पेज 9/12
फेसबुक के बाद मोबाइल नंबरों का मामला भी अभियोजन के लिए कब्र खोदने वाला साबित हुआ।
तहरीर में दर्ज 7 विवादित नंबर:
पीड़िता ने अपनी तहरीर में 7 मोबाइल नंबरों से मैसेज/कॉल आने की बात कही थी।
विवेचकों के बयानों ने डुबोया केस:
- PW-5 निरीक्षक प्रभात कुमार: प्रतिपरीक्षा के पैरा 7 में उन्होंने कहा, “मुझे ध्यान नहीं है कि प्रार्थना पत्रों पर अंकित मोबाइल नंबर पंकज चन्द के हैं या नहीं।” यानी मुख्य विवेचक को ही बेसिक जानकारी नहीं थी।
- PW-6 उपनिरीक्षक मेघा शर्मा: प्रतिपरीक्षा के पैरा 12 में उन्होंने स्पष्ट स्वीकार किया कि “प्रार्थना पत्र में दिए गए दोनों मोबाइल नंबर अभियुक्त के नाम दर्ज होना नहीं पाया गया।” उन्होंने यह भी माना कि बाकी मोबाइल नंबरों के बारे में कोई जांच नहीं की गई।
कोर्ट का निष्कर्ष: पैरा 15 में कोर्ट ने लिखा कि अभियोजन की ओर से ऐसा कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे साबित हो कि उक्त मोबाइल नंबर अभियुक्त पंकज चन्द द्वारा उपयोग में लाए गए थे।
7. कानूनी सिद्धांत: “संदेह से परे प्रमाण” क्यों जरूरी है
पैरा 16 में कोर्ट ने दांडिक विधिशास्त्र के सबसे अहम सिद्धांत को दोहराया: “दोषसिद्धि के लिए अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोपों का संदेह से परे सिद्ध होना आवश्यक है।”
इस केस में सिद्धांत कैसे लागू हुआ:
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने साक्ष्य के द्वारा आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं कर सका। न फेसबुक का लिंक मिला, न मोबाइल का। सिर्फ पीड़िता का मौखिक कथन था, जिसे तकनीकी साक्ष्य से पुष्ट नहीं किया गया। डिजिटल अपराधों में मौखिक आरोप काफी नहीं होते।
8. अंतिम आदेश: संदेह का लाभ देकर बाइज्जत बरी
इन सभी तथ्यों, गवाहों के बयानों और कानूनी सिद्धांतों का विश्लेषण करने के बाद, कोर्ट ने पैरा 17 में अपना अंतिम आदेश सुनाया:
“अभियुक्त पंकज चन्द को भा०दं०सं० की धारा 354डी के आरोप से संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया जाता है।”
धारा 437ए का पालन: अभियुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 437ए के प्रावधानों के तहत 6 माह की अवधि के लिए बंधपत्र प्रस्तुत करने को कहा गया, जो उच्च न्यायालयों में अपील के दौरान उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए एक मानक प्रक्रिया है।
9. इस फैसले के 5 बड़े कानूनी संदेश
- डिजिटल फुटप्रिंट के बिना सजा नहीं: स्टॉकिंग, साइबर बुलिंग जैसे मामलों में IP एड्रेस, IMEI, MAC एड्रेस, टावर लोकेशन, CDR जैसे तकनीकी साक्ष्य अनिवार्य हैं। सिर्फ “उसने मैसेज किया” कहना काफी नहीं।
- सोशल मीडिया कंपनियों से डेटा लेना जरूरी: फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम जैसी कंपनियां कानून के तहत भारतीय एजेंसियों को डेटा देने को बाध्य हैं। विवेचक को लीगल नोटिस भेजकर लॉगिन हिस्ट्री, चैट बैकअप मांगना चाहिए।
- मोबाइल स्वामित्व साबित करना विवेचक का काम: तहरीर में लिखे नंबरों का CAF फॉर्म निकलवाकर यह साबित करना होगा कि नंबर किसके नाम है। “मुझे ध्यान नहीं” जैसा बयान केस को खत्म कर देता है।
- 65B प्रमाणपत्र की अनिवार्यता: किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सबूत – स्क्रीनशॉट, कॉल रिकॉर्डिंग, चैट – को कोर्ट में वैध मानने के लिए 65B प्रमाणपत्र चाहिए। इसके बिना वह कागज का टुकड़ा मात्र है।
- “संदेह का लाभ” अभियुक्त का अधिकार: अगर अभियोजन 100% केस साबित नहीं कर पाता, तो 1% संदेह भी अभियुक्त को बरी करने के लिए काफी है। यह आपराधिक न्याय का मूल सिद्धांत है।
10. तकनीक के युग में तकनीकी विवेचना ही एकमात्र रास्ता
पंकज चन्द बनाम उत्तराखंड राज्य का यह फैसला साफ संदेश देता है कि 21वीं सदी के अपराधों की जांच 20वीं सदी के तरीकों से नहीं हो सकती। जब आरोप डिजिटल माध्यम का है, तो सबूत भी डिजिटल होने चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश से यह स्थापित किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने के लिए पुलिस और अभियोजन को “संदेह से परे” केस बनाना होगा। सिर्फ FIR और धारा 164 के बयान से काम नहीं चलेगा। IP Address से लेकर IMEI तक, हर डिजिटल फुटप्रिंट को कागज पर लाना होगा और उसे 65B से प्रमाणित करना होगा।
अभियुक्त पंकज चन्द के लिए यह “बाइज्जत बरी” है, क्योंकि कोर्ट ने माना कि उसके खिलाफ आरोप साबित ही नहीं हुए।
केस विवरण: नया फौजदारी वाद संख्या-19/2024, पुराना फौजदारी वाद संख्या-279/2024
निर्णय दिनांक: 09-04-2026
न्यायालय: सिविल जज (सी०डि०)/न्यायिक मजिस्ट्रेट, पिथौरागढ़
धारा: 354डी भा०दं०सं०
परिणाम: संदेह का लाभ देकर दोषमुक्त
वहीं निर्दोष पाए गए पंकज ने बताया कि उन्हें माननीय कोर्ट पर पूरा भरोसा है और आखिरकार उन्हें वर्षों के संघर्ष के बाद अब न्याय मिला है, जिसके लिए उन्होंने माननीय कोर्ट, जांच अधिकारी और अपने ज्ञानी अधिवक्ता का धन्यवाद किया।

