मां जियारानी समिति के गंभीर आरोप—कुमाऊंनी-गढ़वाली समाज के लोगों पर कथित हमले के बाद उन्हीं पर FIR; अधिकांश नामजद लोगों के वरिष्ठ नागरिक होने का दावा
हल्द्वानी/रानीबाग। रानीबाग स्थित चित्रेश्वर धाम मंदिर और धार्मिक भूमि से जुड़ा विवाद अब गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक सवालों में बदल गया है। मां जियारानी समिति ने पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि मंदिर और कथित अतिक्रमण का विरोध करने पहुंचे कुमाऊंनी-गढ़वाली समाज के लोगों पर हमला किया गया, लेकिन कार्रवाई उन्हीं के खिलाफ कर दी गई।
समिति का दावा है कि पुलिस द्वारा दर्ज FIR में शामिल लोगों में कई वरिष्ठ नागरिक हैं जो पौराणिक शिव मंदिर बचाने को दिल्ली, मुंबई, देहरादून आदि स्थानों से पहुंचे थे। समिति का आरोप है कि कथित रूप से पीड़ित लोगों को ही आरोपी बना दिया गया, जबकि जिन लोगों पर हमला करने का आरोप है, उनके खिलाफ कोई कार्नरवाई नहीं की गई, बल्कि पुलिस उनके इशारे में ही कार्य कर रही है।
🔴 कुमाऊंनी-गढ़वाली समाज पूछ रहा—FIR में पीड़ित कौन, आरोपी कौन?
समिति का आरोप है कि रानीबाग मंदिर विवाद में कुमाऊंनी-गढ़वाली समाज के लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की आवाज उठाने पहुंचे थे। इसी दौरान कथित मारपीट और विवाद हुआ।
समिति का सवाल है—
अगर समाज के लोगों पर हमला हुआ तो हमलावरों पर कार्रवाई कहां है?
अगर वरिष्ठ नागरिक घटना में शामिल नहीं थे तो उन्हें FIR में आरोपी बनाने का आधार क्या है?
क्या CCTV और मोबाइल वीडियो की जांच सभी पक्षों के संदर्भ में की गई?
इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। मां जियारानी समिति के लोगों का आरोप है कि अवैध कब्जाधारियों ने वरिष्ठ नागरिकों से और महिलाओं पर हमला किया जिसके वीडियोज़ उनके पास मौजूद हैं और पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की है।
🛕 रानीबाग में शनि मंदिर के बहाने कथित कब्जे का आरोप
मां जियारानी समिति का सबसे गंभीर आरोप रानीबाग मंदिर परिसर में शनि मंदिर के नाम पर कथित कब्जे को लेकर है।
समिति का दावा है कि शनि मंदिर के बहाने मंदिर परिसर की भूमि पर धीरे-धीरे अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया गया।
दूसरी ओर शनि मंदिर से जुड़े पक्ष इन आरोपों को खारिज करता है और मंदिर की स्थापना 20 वर्ष पुरानी होने का दावा करता है।
ऐसे में सवाल भावनाओं से नहीं बल्कि राजस्व रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों से तय होना चाहिए। हालांकि प्राधिकरण द्वारा पौराणिक मंदिर में हो रहे अतिक्रमण हटाने हेतु नोटिस किया भेजा गया है, जिसपर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है जिसके पास सम्बंध में कत्यूरी समाज कई वर्षों तक से प्रशासन से मांग को कर रहा है। इसलिए उनका आरोप है कि मंदिर की भूमि को खुर्द पुर्द करने की साजिश में राजनीतिक लोगों का स्पष्ट रूप से हाथ है, जिन्हें वो जल्द पहाड़ी आर्मी समाज के आगे सबूतों के साथ रखेंगे।
🔥 “पहले अवैध चौपाटी, अब शिवजी के मंदिर में भवन”—गंभीर आरोप
विवाद से जुड़े पक्षों द्वारा यह भी आरोप लगाया गया है कि पहले ऐतिहासिक कुमाऊंनी-गढ़वाली समाज के देवी-देवताओं के मंदिर क्षेत्र में कथित अवैध चौपाटी बनाई गई और अब शिवजी के मंदिर परिसर में कथित रूप से अवैध भवन निर्माण कर दिया गया।
इस संबंध में लामबंद रहे पहाड़ी आर्मी के अध्यक्ष और मंदिर समिति के सदस्य हरीश रावत ने भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। हरीश रावत इस मामले में काफी मुखर रहे हैं और उन्होंने पूर्व में अवैध चौपाटी को ध्वस्त कराकर मंदिर की भूमि को बचाया है जिससे पहाड़ी समाज में उन्हें भरपूर समर्थन मिल रहा है।
यदि किसी मंदिर की भूमि पर बिना अनुमति निर्माण हुआ है तो प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि—
- जमीन का स्वामित्व किसके नाम है?
- निर्माण की अनुमति किसने दी?
- नक्शा स्वीकृत हुआ या नहीं?
- राजस्व रिकॉर्ड में भूमि की स्थिति क्या है?
- पूर्व में प्रशासन ने कोई जांच की थी या नहीं?
लेकिन प्रशासन इस मामले में चुप्पी साधे बैठा है जिस कारण पहाड़ी समाज में भारी रोष है।
⚠️ मंदिरों पर कब्जे का आरोप—कुमाऊंनी-गढ़वाली के मंदिर पर हो रहे अतिक्रमण से समाज में नाराजगी
मां जियारानी समिति का आरोप है कि कुमाऊं और गढ़वाल के देवी-देवताओं के मंदिरों तथा उनसे जुड़ी जमीनों पर कथित कब्जे और अवैध निर्माण के मामलों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
समिति का कहना है कि मंदिर केवल भवन नहीं बल्कि कुमाऊंनी-गढ़वाली समाज की सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत हैं।
इसीलिए मंदिर भूमि पर कथित अतिक्रमण का मुद्दा अब व्यापक सामाजिक चिंता का विषय बनता जा रहा है।
🏛️ सत्तापक्ष से जुड़े लोगों पर राजनीतिक संरक्षण का आरोप
मां जियारानी समिति ने सत्तापक्ष से जुड़े कुछ स्थानीय राजनीतिक लोगों पर कथित संरक्षण देने का आरोप भी लगाया है।
समिति का दावा है कि राजनीतिक प्रभाव के कारण प्रशासनिक कार्रवाई प्रभावित हो रही है।
हालांकि यह गंभीर आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। संबंधित राजनीतिक लोगों का पक्ष भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
⚖️ देवभूमि के लोग न्यूज़ के 7 बड़े सवाल
1. रानीबाग मंदिर की जमीन का वास्तविक स्वामित्व किसके पास है?
2. शनि मंदिर जिस भूमि पर स्थित है, उसका राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता है?
3. वहां हुए निर्माण के लिए किस विभाग से अनुमति ली गई?
4. कथित अवैध चौपाटी और भवन निर्माण पर पहले प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?
5. विवाद के दौरान हमला किसने किया और क्या CCTV/वीडियो से इसकी पुष्टि हुई?
6. FIR में नामजद वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ पुलिस के पास क्या साक्ष्य हैं?
7. सत्तापक्ष के राजनीतिक संरक्षण के आरोपों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई जाती?
प्रशासन करे निष्पक्ष कार्रवाई, वरना कोर्ट जाने की स्थिति: रमेश मनराल
रानीबाग विवाद में अब कुमाऊंनी-गढ़वाली समाज, मंदिर भूमि, कथित अतिक्रमण, FIR, वरिष्ठ नागरिकों पर कार्रवाई और राजनीतिक संरक्षण जैसे गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मां जियारानी समिति के अध्यक्ष रमेश मनराल ने कहा है कि इस मामले प्रशासन को कार्यवाही करनी है। उनके द्वारा साक्ष्य अभिलेख उपलब्ध करा दिए गए हैं और मंदिर कुमाऊं-गढ़वाल और नेपाल समाज के लोगों का है, जिसका 1500 वर्षों से अधिक का लिखित साक्ष्य मौजूद है।
मंदिर समिति से जुड़ी सीता रावत ने बताया कि मंदिर के सेवारत गोस्वामी परिवार मंदिर की देखभाल हेतु वहां सेवारत की भूमिका में है तो कैसे वो जमीन बेचने का अधिकारी हो गया। उनका स्पष्ट कहना है कि मंदिर की देखभाल करने वाला मालिक नहीं होता है, बल्कि सेवारत है और इस मामले में देवी देवता स्वयं ही न्याय करेंगे। वरिष्ठ नागरिक परिपूर्ण वात्सायन ने कहा की मंदिर समिति सिर्फ एक माध्यम है जो लोक तांत्रिक माध्यम से अपनी बात प्रशासन तक रखने की कोशिश कर रहा है। लेकिन संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध प्रशासन दबाव में कार्यवाही कर रहा है।
मामले में दोनों पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
यदि अतिक्रमण हुआ है तो दोषियों पर कार्रवाई हो।
यदि मंदिर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो।
और यदि निर्दोष वरिष्ठ नागरिकों को गलत तरीके से आरोपी बनाया गया है तो उसकी जवाबदेही भी तय हो।
रानीबाग मंदिर की भूमि, कथित निर्माण और 29 अगस्त की घटना की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा जांच के आधार पर तथ्य सार्वजनिक किए जाएं।
मंदिर की जमीन किसकी है?
निर्माण वैध है या अवैध, हालांकि पूर्व में पटवारी और प्राधिकरण ने नोटिस भेजकर कार्यवाही की बात करी तो उसके बाद किसके दबाव में प्राधिकरण ने अवैध निर्माण ध्वस्त क्यों नहीं किया?
हमला किसने किया? मंदिर की जमीन में चौपाटी खोलने और अवैध कब्जा करने वाले कौन लोग हैं?
और FIR में नामजद लोगों की वास्तविक भूमिका क्या थी?
इन सवालों के जवाब ही रानीबाग विवाद की पूरी सच्चाई सामने ला सकते हैं।

