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दो साल से ‘समकक्ष’ का अर्थ खोज रहा विभाग: उत्तराखंड की नौकरशाही की ऐसी कहानी जिस पर हंसे या रोएं?

देवभूमि के लोग | विशेष खोजी रिपोर्ट

500 से अधिक प्रवक्ता पद खाली, हजारों युवा बेरोजगार, तकनीकी शिक्षा बदहाल… और सरकारी फाइलें अभी भी ‘समकक्ष’ खोज रही हैं।

देहरादून।

यदि कभी “प्रशासनिक विडंबना” की परिभाषा लिखी जाएगी तो उत्तराखंड की राजकीय पॉलीटेक्निक प्रवक्ता भर्ती उसका सबसे उपयुक्त उदाहरण बन सकती है।

करीब दो वर्षों से 500 से अधिक प्रवक्ता पदों की भर्ती केवल इसलिए शुरू नहीं हो पा रही क्योंकि भर्ती नियमावली बनाने वाला विभाग स्वयं यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि उसमें लिखा “समकक्ष (Equivalent)” आखिर है क्या।

जी हाँ।

न कोई कठिन वैज्ञानिक सिद्धांत। न कोई अंतरराष्ट्रीय कानून। न कोई संवैधानिक संशोधन।

सिर्फ एक शब्द—समकक्ष।

और उस एक शब्द ने हजारों युवाओं का भविष्य, सरकारी कॉलेजों की पढ़ाई और पूरे भर्ती तंत्र को दो वर्षों से बंधक बना रखा है।


विभाग ने नियम बनाए, लेकिन नियमों का अर्थ भूल गया

भर्ती नियमावली किसने बनाई?

उसी विभाग ने जिसे आज यह समझ नहीं आ रहा कि उसके अपने नियम का अर्थ क्या है।

यह प्रश्न अब केवल भर्ती का नहीं रह गया है।

यह सरकारी कार्यप्रणाली की गुणवत्ता, फाइल संस्कृति और जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है।


लोक सेवा आयोग ने कह दिया—पहले नियम स्पष्ट करो

राज्य लोक सेवा आयोग ने तकनीकी शिक्षा विभाग को स्पष्ट रूप से लिख दिया कि जब तक “समकक्ष” की परिभाषा स्पष्ट नहीं होगी, तब तक भर्ती प्रक्रिया शुरू करना उचित नहीं है क्योंकि आगे न्यायिक विवाद पैदा हो सकते हैं।

इसका अर्थ साफ है—

आयोग अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है।

लेकिन नियम बनाने वाला विभाग दो वर्षों से उसी स्थान पर खड़ा है जहाँ से यात्रा शुरू हुई थी।


फाइलें चलती रहीं, समय रुक गया

इन दो वर्षों में क्या-क्या बदल गया?

  • हजारों अभ्यर्थियों की आयु बढ़ गई।
  • कई उम्मीदवार ओवरएज होने की कगार पर पहुंच गए।
  • कॉलेजों में शिक्षक नहीं मिले।
  • छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई।
  • सरकार रोजगार देने के दावे करती रही।
  • और फाइलें “समकक्ष” का अर्थ खोजती रहीं।

कई युवाओं का कहना है कि यदि यही गति रही तो अगली भर्ती शायद तब निकले जब वर्तमान अभ्यर्थी स्वयं सेवानिवृत्ति की आयु के करीब पहुँच जाएँ।


राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान और बेरोजगार संघ अध्यक्ष राम कंडवाल की लगातार पहल

राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान एवं उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल ने इस मुद्दे को कई बार अधिकारियों के सामने उठाया। सचिव स्तर पर मुलाकातें हुईं, समाधान के आश्वासन मिले, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। इससे अभ्यर्थियों की निराशा और बढ़ी है पर शीघ्र कार्रवाई का आश्वाशन मिला है। हालांकि आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान और उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल इस मुद्दे पर लगातार हर स्तर पर लगातार उठा रहे हैं और दोनों ही युवाओं से जुड़े रहते हैं।


क्या यही कारण है कि सरकारी व्यवस्थाएँ धीमी पड़ जाती हैं?

यह मामला एक बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है।

जब निर्णय समय पर नहीं होते, फाइलें महीनों और वर्षों तक लंबित रहती हैं, और अस्पष्ट नियमों को समय रहते ठीक नहीं किया जाता, तब उसका असर केवल एक भर्ती पर नहीं पड़ता।

इसी तरह की देरी का प्रभाव शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क निर्माण, सिंचाई, तकनीकी संस्थानों, सार्वजनिक सेवाओं और रोजगार से जुड़े अनेक क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इसलिए प्रशासनिक दक्षता, समयबद्ध निर्णय और स्पष्ट नियम किसी भी राज्य के सुशासन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।


क्या विभागों में समय-समय पर दक्षता परीक्षण होने चाहिए?

यह मामला एक नीति संबंधी बहस भी खड़ी करता है।

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकारी विभागों में केवल नियुक्ति के समय ही नहीं, बल्कि समय-समय पर प्रशिक्षण और क्षमता-विकास आवश्यक है।

ऐसे उपायों पर विचार किया जा सकता है:

  • नियमित रिफ्रेशर ट्रेनिंग।
  • सेवा नियमों और कानूनों का अद्यतन प्रशिक्षण।
  • डिजिटल फाइल प्रबंधन का प्रशिक्षण।
  • समयबद्ध निर्णय लेने के मानक।
  • प्रदर्शन आधारित समीक्षा।
  • पदोन्नति से पहले प्रशासनिक एवं विधिक ज्ञान का मूल्यांकन।
  • विलंब के मामलों में जवाबदेही तय करने की स्पष्ट व्यवस्था।

इनका उद्देश्य किसी कर्मचारी को दंडित करना नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता और सार्वजनिक सेवा की गुणवत्ता बढ़ाना होना चाहिए।


सबसे बड़ा सवाल—दो वर्षों का हिसाब कौन देगा?

सरकारी फाइलों में दर्ज यह केवल “दो वर्ष” हैं।

लेकिन एक अभ्यर्थी के जीवन में यह दो वर्ष हो सकते हैं—

  • बेरोजगारी के,
  • आर्थिक कठिनाइयों के,
  • प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में खर्च हुए समय के,
  • परिवार की उम्मीदों के,
  • और लगातार टूटते विश्वास के।

सरकारी तंत्र की असली परीक्षा यही है कि वह नागरिकों का समय बचाए, न कि उसे अनिश्चित प्रतीक्षा में बदल दे।


आप निम्न अनुभाग जोड़ सकते हैं। इसमें आलोचना को तथ्यात्मक और संपादकीय शैली में रखा गया है, बिना अप्रमाणित आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत किए:


एई-जेई भर्ती भी वर्षों से इंतज़ार में: मुख्यमंत्री के निर्देश और विभागीय सुस्ती के बीच फंसे युवा

पॉलीटेक्निक प्रवक्ता भर्ती अकेली ऐसी भर्ती नहीं है, जो प्रशासनिक अस्पष्टता और विभागीय देरी का शिकार हुई हो। उत्तराखंड में सहायक अभियंता (AE) और कनिष्ठ अभियंता (JE) की भर्तियों को लेकर भी लंबे समय से अभ्यर्थियों में असंतोष देखने को मिलता रहा है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समय-समय पर विभागों को रिक्त पदों पर नियमित और समयबद्ध भर्ती करने के निर्देश देते रहे हैं। सरकार सार्वजनिक मंचों पर भी युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने और रिक्त पदों को भरने की प्रतिबद्धता दोहराती रही है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि नीति स्तर पर भर्ती कराने की इच्छा व्यक्त की जाती है, तो कई विभागों में फाइलें महीनों और कभी-कभी वर्षों तक क्यों अटकी रहती हैं?

यदि किसी विभाग में हजारों इंजीनियर बेरोजगार बैठे हों और दूसरी ओर शहरों तथा गांवों में विकास परियोजनाओं, पेयजल योजनाओं, पुलों, सड़कों, भवनों और शहरी नियोजन के लिए पर्याप्त अभियंता उपलब्ध न हों, तो यह केवल भर्ती का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि प्रशासनिक क्षमता और विकास की गति से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।

उत्तराखंड जैसा पर्वतीय राज्य आधुनिक इंजीनियरिंग, वैज्ञानिक योजना, आपदा प्रबंधन, भू-स्खलन नियंत्रण, जल संरक्षण, स्मार्ट शहरों और टिकाऊ ग्रामीण आधारभूत ढांचे की मांग करता है। ऐसे समय में यदि तकनीकी पद लंबे समय तक खाली रहें, तो इसका असर परियोजनाओं की गुणवत्ता, समयसीमा और सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ सकता है।

युवाओं का प्रश्न सीधा है—यदि सरकार भर्ती चाहती है, तो विभाग उन्हें समय पर पूरा क्यों नहीं करते? यदि किसी अधिकारी के स्तर पर फाइलें अनावश्यक रूप से लंबित रहती हैं, तो क्या ऐसी देरी की जवाबदेही तय करने की कोई प्रभावी व्यवस्था है?


फाइलों पर धूल, युवाओं के सपनों पर बोझ

हर लंबित भर्ती के पीछे केवल एक फाइल नहीं होती।

उसके पीछे होते हैं—

  • प्रतियोगी परीक्षाओं की वर्षों की तैयारी,
  • परिवार की आर्थिक उम्मीदें,
  • बढ़ती आयु सीमा की चिंता,
  • और राज्य में रहकर सेवा करने का सपना।

सरकारी कार्यालयों में यदि एक फाइल महीनों तक नहीं चलती, तो अभ्यर्थी के जीवन के कई महत्वपूर्ण महीने और कभी-कभी वर्ष निकल जाते हैं। यही कारण है कि समयबद्ध भर्ती केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सुशासन की कसौटी मानी जाती है।


समय की मांग: जवाबदेही, प्रशिक्षण और प्रदर्शन आधारित प्रशासन

यह पूरा प्रकरण एक व्यापक नीति सुधार की आवश्यकता की ओर संकेत करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि विभागों में निम्न सुधारों पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है—

  • प्रत्येक रिक्त पद के लिए भर्ती का वार्षिक कैलेंडर।
  • भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक देरी पर कारण दर्ज करने और उसकी समीक्षा की व्यवस्था।
  • नियमावली तैयार करने वाले अधिकारियों के लिए नियमित विधिक एवं प्रशासनिक प्रशिक्षण।
  • पदोन्नति से पहले अद्यतन कानूनों, सेवा नियमों और प्रशासनिक दक्षता का मूल्यांकन।
  • ई-ऑफिस आधारित फाइल ट्रैकिंग, ताकि किसी फाइल के अनावश्यक रूप से लंबित रहने की स्थिति सार्वजनिक रूप से मॉनिटर की जा सके।
  • विभागीय प्रदर्शन के लिए समयबद्ध लक्ष्य और उनकी स्वतंत्र समीक्षा।

सवाल केवल यह नहीं है कि “समकक्ष” का अर्थ दो वर्षों में क्यों स्पष्ट नहीं हो पाया। सवाल यह भी है कि ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए संस्थागत सुधार कब होंगे।


इस प्रकार की चर्चा का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर प्रश्न उठाना है जिनका सीधा प्रभाव युवाओं के रोजगार, तकनीकी शिक्षा और राज्य के विकास पर पड़ता है। यदि समयबद्ध भर्ती, स्पष्ट नियम और जवाबदेही सुनिश्चित हों, तो इससे अभ्यर्थियों, शैक्षणिक संस्थानों और राज्य—तीनों को लाभ मिल सकता है।

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