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हल्द्वानी में मिली 227वीं लावारिस लाश…उत्तराखंड की पहाड़ी सुंदरता के बीच एक छिपी हुई त्रासदी है – लावारिस शवों की बढ़ती संख्या, प्रशासन सोया !

हल्द्वानी (नैनीताल जिला): कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया जहां मौत के बाद भी इंसान अकेला रह जाता है। कोई नाम नहीं, कोई चेहरा नहीं जो उसे याद करे, कोई हाथ नहीं जो आखिरी विदाई दे। नदी के ठंडे किनारे झाड़ियों में लेटी वो देह—जैसे दुनिया ने कह दिया, “तुम्हें कोई नहीं चाहता।” लेकिन रानीबाग इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में कुछ इंसान और समाजसेवी खड़े हो गए हैं, जिसकी दिल की रोशनी पूरी दुनिया को जगमगा रही है।

हेमंत गौनिया—2008 में सड़क हादसे में कुछ रोशनी खो चुके, फिर भी दूसरों के लिए जीवन की किरण बने। उन्होंने उस अज्ञात आत्मा को गोद में उठाया, जैसे वो उनका अपना हो। उनकी टीम ने हाथ जोड़कर, 227वीं बार साबित किया—मौत इंसान को अकेला नहीं छोड़ सकती, जब तक इंसानियत जिंदा है।

लावारिस शवों की बढ़ती समस्या: हल्द्वानी और उत्तराखंड में कारण, प्रभाव और समाधान

यह रिपोर्ट लावारिस शवों के कारणों, हल्द्वानी-उत्तराखंड में स्थिति, बेघर लोगों की समस्या, शेल्टर की जरूरत और समाधान पर केंद्रित है। यह दिखाती है कि क्यों यह मुद्दा जांच और तत्काल कार्रवाई का विषय है।

उत्तराखंड की पहाड़ी सुंदरता के बीच एक छिपी हुई त्रासदी है – लावारिस (unclaimed/unidentified) शवों की बढ़ती संख्या

हल्द्वानी जैसे मैदानी शहरों में नदियों के किनारे, जंगलों में या सड़कों पर अज्ञात शव मिलना आम हो गया है। समाजसेवी हेमंत गौनिया ने पिछले कुछ वर्षों में 227 से अधिक ऐसे शवों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार किया है। यह संख्या सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता, प्रशासनिक कमियों और मानवीय संकट का प्रतीक है।

लावारिस शवों की स्थिति: आंकड़े और वास्तविकता

उत्तराखंड में हर साल सैकड़ों अज्ञात शव मिलते हैं। विभिन्न अध्ययनों और RTI से मिले आंकड़ों से पता चलता है:

  • पिछले 5 वर्षों में 231 अज्ञात महिलाओं के शव मिले, जिनकी कोई पहचान नहीं हुई।
  • हल्द्वानी में हेमंत गौनिया ने 2025 तक 197 और 2026 तक 227 लावारिस शवों का संस्कार किया। यह संख्या कोरोना काल में भी जारी रही।
  • उत्तराखंड में बड़े आपदाओं (जैसे 2013 केदारनाथ बाढ़) में हजारों शव अज्ञात रहे। 2013 में 4,120 लोग लापता घोषित हुए, लेकिन DNA से सिर्फ 20 की पहचान हुई।
  • सामान्य दिनों में भी हल्द्वानी-नैनीताल क्षेत्र में नदी किनारे, रेलवे ट्रैक या जंगलों में शव मिलते हैं। कारण: ठंड, हादसे, बीमारी या अपराध।

उत्तर भारत में (जैसे लखनऊ अध्ययन में) 15% से अधिक ऑटोप्सी केस लावारिस होते हैं, ज्यादातर 41-60 साल के पुरुष। मौत के तरीके: दुर्घटना (34%), आत्महत्या (33%), प्राकृतिक (29%)। उत्तराखंड में भी यही पैटर्न दिखता है – सड़क/रेल हादसे, नदी में डूबना, ठंड से मौत।

मुख्य कारण: क्यों इतने लावारिस शव?

  1. पलायन और माइग्रेशन
    उत्तराखंड से पहाड़ों से मैदान की ओर पलायन बहुत तेज है। 2007-2017 में 3.83 लाख लोग पलायन कर चुके। 2018-22 में 3.3 लाख और। RTI से पता चला कि 1.18 लाख स्थायी पलायन, 3.83 लाख काम की तलाश में।
  • हल्द्वानी एक प्रमुख प्रवेश द्वार है – रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, निर्माण कार्य। मजदूर अकेले आते हैं, परिवार पीछे।
  • अगर हादसा हो जाए, बीमारी या ठंड से मौत, तो कोई सूचना नहीं पहुंचती।
  • गांव “भूतिया गांव” (ghost villages) बन रहे हैं – 1,792 से अधिक गांव खाली। युवा (26-35 साल) सबसे ज्यादा पलायन करते हैं।
  1. बेघर और असुरक्षित जीवन
    शहरों में बेघर लोग बढ़ रहे हैं। हल्द्वानी में रेलवे स्टेशन के पास 50,000 लोग बेघर होने के खतरे में थे (सुप्रीम कोर्ट ने बचाया)।
  • सर्दियों में नदी किनारे सोना, ठंड लगना आम।
  • गरीबी, नशा, मानसिक बीमारी से परिवार टूटते हैं।
  • महिलाओं के मामले: ट्रैफिकिंग, घरेलू हिंसा या पलायन से जुड़े।
  1. प्राकृतिक और मानवीय खतरे
  • नदियां (गौला आदि): गिरना या डूबना।
  • सड़क/रेल हादसे: हाईवे और रेलवे पर मौतें।
  • आपदाएं: बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना। 2021 में 300 मौतें।
  • सैंड माइनिंग: गड्ढों में डूबना।
  1. प्रशासनिक कमियां
  • शिनाख्त में देरी: 72 घंटे मोर्चरी में रखना, फोटो जारी, लेकिन कोई नहीं आता।
  • पोस्टमार्टम ट्रांसफर: नैनीताल से हल्द्वानी भेजना – संसाधन की कमी।
  • डीएनए/फिंगरप्रिंट: बड़े मामलों में, रोजाना नहीं।
  • पुलिस व्यस्त: जांच पूरी नहीं होती।

हेमंत गौनिया: इंसानियत की मिसाल

हेमंत गौनिया (दृष्टिबाधित) 2008 में हादसे में रोशनी खो चुके। फिर भी उन्होंने RTI से खुलासे किए (अस्पताल में 13,187 मौतें, 5 लाख पलायन)।

  • लावारिस शवों का संस्कार उनका मुख्य कार्य। टीम के साथ एंबुलेंस, लकड़ी, सामग्री खुद लाते हैं।
  • कहते हैं: “जिनका कोई नहीं, उनके हम हैं।”
  • 227 संस्कार: कोरोना में भी जारी।
    यह सिस्टम की नाकामी है कि एक व्यक्ति को इतना बोझ उठाना पड़ रहा है।

बेघर लोगों के लिए शेल्टर की जरूरत

भारत में DAY-NULM (Deendayal Antyodaya Yojana – National Urban Livelihoods Mission) के तहत Shelters for Urban Homeless (SUH) है।

  • हर 1 लाख आबादी पर 50-100 लोगों का शेल्टर।
  • 24×7, खाना, पानी, स्वास्थ्य, बिस्तर।
  • उत्तराखंड में स्थिति: कुल 22 शेल्टर (988 क्षमता), लेकिन हल्द्वानी में बहुत कम। कई शहरों में NGO पर निर्भर।

शेल्टर क्यों जरूरी?

  • मौत रोकना: सर्दियों में ठंड से मौत कम।
  • शिनाख्त: रजिस्ट्रेशन से परिवार को पता।
  • सुरक्षा: हिंसा, बीमारी से बचाव।
  • सम्मान: बेघर को इंसान जैसा जीवन।

समस्या: फंड जारी लेकिन क्रियान्वयन कम। उत्तराखंड में SUH कमजोर।

समाधान और सुझाव

  1. प्रशासनिक सुधार
  • डीएनए डेटाबेस और मिसिंग पर्सन लिस्ट लिंक।
  • हर शव की फोटो/विवरण ऑनलाइन/मीडिया में।
  • मोर्चरी में बेहतर सुविधा, ट्रांसफर कम।
  • पुलिस को विशेष टीम।
  1. शेल्टर विस्तार
  • DAY-NULM के तहत नए शेल्टर: हल्द्वानी में कम से कम 5-10।
  • सर्दियों में विशेष कैंप।
  • NGO/समाज के साथ PPP मॉडल।
  1. पलायन रोकना
  • पहाड़ों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य।
  • माइग्रेंट रजिस्ट्रेशन।
  1. समाज की भूमिका
  • हेमंत गौनिया जैसे लोगों का समर्थन (98972 13226)।
  • जागरूकता, दान, वॉलंटियर।

लावारिस शव सिर्फ आंकड़े नहीं – वे खोई हुई जिंदगियां हैं। हल्द्वानी-उत्तराखंड में पलायन, बेघरपन, आपदाएं और सिस्टम की कमियां इसे बढ़ा रही हैं। हेमंत गौनिया जैसे लोग इंसानियत बचा रहे हैं, लेकिन सरकार और समाज को जिम्मेदारी लेनी होगी। शेल्टर, जांच और संवेदना से हम मौत के बाद भी सम्मान दे सकते हैं।

यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं…
यह उन लाखों आत्माओं की पुकार है जो बिना विदाई के चली गईं। यह उन लोगों की उम्मीद है जो सोचते हैं—कोई तो होगा जो हमें याद रखेगा। हेमंत गौनिया जैसे लोग साबित करते हैं कि इंसानियत की कोई सीमा नहीं। दर्द को शक्ति बनाओ, अंधेरे को रोशनी से जीतो।

अगर आपके दिल में भी वो संवेदना है, तो आगे आएँ। दाह सामग्री, लकड़ी, एंबुलेंस—कुछ भी। संपर्क करें: 98972 13226
एक छोटा सहयोग, एक बड़ी आत्मा को मोक्ष दे सकता है।

हेमंत गौनिया और उनकी टीम को सलाम…
और उन 227 आत्माओं को श्रद्धांजलि।
काश, दुनिया में ऐसे और हेमंत हों—तब शायद कोई लावारिस न बचे।
क्योंकि नर सेवा ही नारायण सेवा है, और हेमंत जी इसे जीते हैं।

यह समस्या हल हो सकती है – अगर हम अब जागें। इंसानियत की जीत तभी होगी जब कोई लावारिस न बचे।

By Karan

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