Fri. Apr 3rd, 2026

वन्यजीवों का आतंक: उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की भयावह तस्वीर, चार वर्षीय डृष्टि रावत की निर्मम हत्या, वन विभाग की पूर्ण विफलता, भ्रष्टाचार, अंदरूनी कलह और सुप्रीम कोर्ट की फटकार

Haldwani/ Dehradun-04.03.2026- By B P Singh– उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में इन दिनों वन्यजीवों का आतंक चरम सीमा पर पहुंच चुका है। जहां एक ओर जंगली जानवरों की आबादी बढ़ रही है और उनके प्राकृतिक आवास सिकुड़ते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानव बस्तियां जंगलों की सीमा पर फैलती जा रही हैं। इस संघर्ष का सबसे दर्दनाक रूप 2-3 अप्रैल 2026 की रात को पौड़ी गढ़वाल जिले के भतकोट गांव में देखने को मिला। मात्र चार वर्षीय नन्ही डृष्टि रावत, जो अपने घर के आंगन में निश्छलता से खेल रही थी, अचानक एक गुलदार के हमले का शिकार बन गई। रात करीब नौ बजे का समय था। अंधेरी रात में गुलदार ने झपट्टा मारा, बच्ची को पकड़ा और जंगल की ओर खींच ले गया। परिवार की चीख-पुकार सुनकर ग्रामीण दौड़े, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घर से लगभग एक किलोमीटर दूर जंगल में बच्ची का क्षत-विक्षत शव मिला। पूरा गांव सदमे में डूब गया। मां-पिता का इकलौता बच्चा, परिवार का सहारा, एक पल में छिन गया।

भतकोट गांव गढ़वाल वन प्रभाग की पोखड़ा रेंज में बसा है। यहां के लोग सदियों से जंगलों के साथ सामंजस्य बनाकर रहते आए हैं। किसानी, पशुपालन और छोटे-मोटे काम उनके जीवन का आधार हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से गुलदारों के हमले इतने बढ़ गए हैं कि लोग घर से बाहर निकलने में भी डरते हैं। डृष्टि की मां ने बताया कि बच्ची रोज शाम को आंगन में खेलती थी। “हमने कभी सोचा नहीं था कि इतनी नजदीकी में इतना खतरा होगा।” पिता ने रोते हुए कहा, “वन विभाग को बार-बार बताया था कि गुलदार गांव के आसपास मंडरा रहा है, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिलते थे।” घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम पहुंची। डीएफओ गढ़वाल महातिम यादव ने पुष्टि की कि पोखड़ा रेंज के भतकोट में यह घटना हुई। वन संरक्षक आकाश वर्मा ने कहा कि टीम ने तुरंत सर्च ऑपरेशन शुरू किया, खतरे को देखते हुए गश्त बढ़ाई गई, पिंजरा लगाने की प्रक्रिया शुरू की गई और ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी गई। लेकिन गांव वाले पूछ रहे हैं – क्यों हर बार घटना हो जाने के बाद ही कार्रवाई? क्यों पहले से कोई रोकथाम नहीं?

यह घटना अकेली नहीं है। उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों का सिलसिला पिछले कई महीनों से लगातार जारी है। पिछले एक सप्ताह में ही कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होंने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया है। 30 मार्च 2026 को पौड़ी गढ़वाल के बालमाना गांव में 48 वर्षीय मिस्त्री प्रकाश लाल घर लौट रहे थे। रास्ते में गुलदार ने उन पर हमला कर दिया। हमला इतना भीषण था कि आधा शरीर खा गया। ग्रामीणों का कहना है कि शायद यही गुलदार पांच दिन पहले (25 मार्च) भी एक अन्य गांव वाले को मार चुका था। यानी एक ही जानवर ने लगातार हमले किए, लेकिन वन विभाग ने इसे पकड़ने में नाकामी दिखाई। इससे पहले 10 मार्च को जामला गांव के पास 48 वर्षीय व्यक्ति पर गुलदार ने हमला किया और मौत हो गई। प्रशासन ने जानवर को पकड़ने या मारने के आदेश जारी किए, लेकिन ग्राउंड पर कुछ नहीं हुआ।

जनवरी 2026 से अब तक (3 अप्रैल 2026) की स्थिति और भी भयावह है। शुरुआती पांच हफ्तों में ही छह मौतें दर्ज की गईं – नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल और रुद्रप्रयाग जिलों में। 4 फरवरी 2026 को भीमताल (नैनीताल) में 60 वर्षीय गंगा देवी गाय का चारा काट रही थीं। गुलदार ने उन पर हमला कर दिया और मौत हो गई। 5 फरवरी को रुद्रप्रयाग के सिंद्रावनी गांव में पांच वर्षीय दक्ष बिष्ट घर के आंगन में खेल रहे थे। गुलदार ने उन्हें उठाकर जंगल की ओर ले गया। शाम करीब 11 बजे शव मिला। 25 जनवरी 2026 को पौड़ी के बारस्वर गांव में डेढ़ साल की यशिका कुमारी अपनी मां की गोद से छीन ली गई। गुलदार ने उन्हें जंगल में खींच लिया। शव बाद में बरामद हुआ। नैनीताल में एक अन्य महिला की मौत गुलदार के हमले में हुई। अल्मोड़ा में एक महिला घायल हुई। पौड़ी गढ़वाल में 45 वर्षीय राजेंद्र नौटियाल की मौत गुलदार हमले में हुई। जनवरी के पहले 20 दिनों में सात मौतें हुईं, जिनमें चार बाघों के हमले भी शामिल थे।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2000 से अब तक उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों में 900 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। इनमें गुलदारों ने 548, हाथियों ने 230, बाघों ने 106 और भालुओं ने 70 मौतें कीं। घायलों की संख्या हजारों में है – गुलदारों से 2127, भालुओं से 2013, हाथियों से 234 घायल। 2025 में अकेले 68 मौतें और 488 घायल हुए। 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही ट्रेंड जारी है। पौड़ी जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां स्कूल बंद कर दिए गए, गांव के लोग सड़क जाम कर प्रदर्शन कर रहे हैं। कई गांव “भूतिया गांव” बनते जा रहे हैं – लोग पलायन कर रहे हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, किसान खेती छोड़ रहे हैं। महिलाएं जंगल में चारा-लकड़ी लेने नहीं जा पा रही। पूरा आर्थिक और सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है।

यह सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि वन विभाग की पूर्ण विफलता की कहानी है। गश्त का नामोनिशान नहीं, कैमरा ट्रैप समय पर नहीं लगते, पिंजरे देर से लगाए जाते हैं, ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं। भतकोट जैसी घटना में विभाग ने कहा – “टीम भेज दी, गश्त बढ़ा दी।” लेकिन गांव वाले बताते हैं कि महीनों से गुलदार गांव के आसपास मवेशी मार रहा था, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। विशेषज्ञ कहते हैं कि लैंटाना कैमरा जैसी विदेशी झाड़ियों ने जंगलों को बंजर बना दिया है, जो शिकार को गांवों की ओर धकेल रही हैं। जंगल की आग, सड़क निर्माण, पर्यटन और बांध परियोजनाएं आवास सिकुड़ा रही हैं। लेकिन वन विभाग इन मूलभूत मुद्दों पर चुप है।

वन विभाग की अंदरूनी कलह और पदों के लिए झगड़े इस विफलता को और बढ़ा रहे हैं। कर्मचारी प्रमोशन, सीनियरिटी और पोस्टिंग को लेकर आपस में लड़ रहे हैं। उच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर हुईं जहां सीनियर अधिकारियों की पोस्टिंग बायपास कर जूनियरों को पद दिए गए। एक मामले में हाईकोर्ट ने होएफएफ के आदेश पर रोक लगा दी। जबकि जानवर मासूमों को नोच रहे हैं, अधिकारी कुर्सी की लड़ाई में व्यस्त हैं। भर्ती घोटालों, पक्षपात और ट्रांसफर में रिश्वतखोरी की खबरें आम हैं। परिणाम – फील्ड स्टाफ का मनोबल गिरा हुआ है, गश्त कम हो रही है, रिपोर्टिंग में लापरवाही।

भ्रष्टाचार की कहानियां भी ताजा हैं। हाल ही में अल्मोड़ा और अन्य क्षेत्रों में अवैध पेड़ कटाई के मामले सामने आए। उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन के अधिकारियों पर 30-32 साल पुराने पेड़ बिना अनुमति काटने का आरोप। ठेकेदारों से मिलीभगत। राज्य में लकड़ी तस्करी का पूरा नेटवर्क चलता है जिसमें कुछ वन अधिकारी शामिल पाए जाते हैं। वन भूमि पर कब्जा, निर्माण और बिक्री के घोटाले आम हैं। जनता कहती है – “एक तरफ विभाग हमें जंगलों से दूर करने पर तुला है, दूसरी तरफ खुद लकड़ी बेच रहा है।”

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में उत्तराखंड सरकार और वन अधिकारियों को खूब फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश एस. कांत की बेंच ने स्वत: संज्ञान लिया। कोर्ट ने कहा – “उत्तराखंड सरकार और अधिकारी मूक दर्शक बने हुए हैं। हजारों एकड़ वन भूमि निजी लोगों द्वारा हड़पी जा रही है, और वे चुपचाप देख रहे हैं।” 2866 एकड़ वन भूमि पर कब्जा का मामला सामने आया। कोर्ट ने निर्माण रुकवाया, जांच समिति गठित की और सभी अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि 2000 से राज्य बनने के बाद से यह व्यवस्थित लूट चल रही है। अधिकारी और निजी लोग मिले हुए हैं। लेकिन जमीन पर बदलाव नजर नहीं आ रहा।

वन विभाग लोगों के अधिकारों पर भी अतिक्रमण कर रहा है। वन गुज्जर समुदाय, जो सदियों से जंगलों में रहते हैं, उन्हें बिना पुनर्वास के बेदखल करने की कोशिशें चल रही हैं। राजाजी नेशनल पार्क, जिम कॉर्बेट में नोटिस जारी। वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जबकि असली समस्या है – जानवर गांवों में घुस रहे हैं क्योंकि विभाग न तो जानवरों को नियंत्रित कर रहा है, न लोगों को सुरक्षा दे रहा है। लोग कहते हैं – “हम जंगलों के संरक्षक हैं, लेकिन विभाग हमें अतिक्रमणकारी बताता है।”

जनता अब गुस्से से भरी हुई है। कई जगहों पर वन अधिकारियों को घेर लिया गया। गैरसैंण में घंटों बंधक बनाया गया। सड़क जाम, प्रदर्शन, धरने। पहाड़ से पलायन बढ़ रहा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि तुरंत वैज्ञानिक तरीके से मॉनिटरिंग, सोलर फेंसिंग, कम्युनिटी अवेयरनेस और प्री-प्रे बेस्ड ट्रैपिंग नहीं शुरू हुई तो स्थिति और बिगड़ेंगी। लेकिन सबसे जरूरी जवाबदेही है – लापरवाह अधिकारियों पर सस्पेंशन, भ्रष्टाचार पर सख्त एक्शन, अंदरूनी कलह खत्म।

डृष्टि रावत की मौत सिर्फ एक घटना नहीं। यह पूरे उत्तराखंड की पीड़ा का प्रतीक है। जहां जंगली जानवर और इंसान दोनों संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वन विभाग अपनी कुर्सियों और भ्रष्टाचार में व्यस्त है। समय आ गया है कि राज्य सरकार और वन विभाग अपनी जिम्मेदारी समझें। वरना पहाड़ खाली हो जाएंगे, जंगली जानवरों का आतंक बढ़ेगा और विकास का सपना चूर-चूर हो जाएगा।

(रिपोर्ट तथ्यों, आंकड़ों और जनहित पर आधारित है।)

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By Karan

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