नई दिल्ली, 20 नवंबर 2025*- सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में बच्चे न होने वाले दंपतियों द्वारा बनाई गई वसीयतों को लेकर कई अहम फैसले सुनाए हैं। इन फैसलों में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या पति या पत्नी को वसीयत से पूरी तरह बाहर किया जा सकता है?
पत्नी को वसीयत से बाहर करना पड़ा भारी
ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए एक व्यक्ति की वसीयत को अवैध घोषित कर दिया। उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी का नाम वसीयत में कहीं नहीं लिया और सारी संपत्ति अपने भतीजे को दे दी। कोर्ट ने कहा,
“पत्नी को वसीयत से पूरी तरह हटाना कोई सामान्य बात नहीं है। यह संदेह पैदा करता है कि वसीयतकर्ता की स्वतंत्र इच्छा थी या नहीं।”
नतीजा यह हुआ कि संपत्ति पत्नी के वारिसों को मिल गई।
कब वसीयत पर सवाल उठता है?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निम्नलिखित परिस्थितियों में वसीयत संदिग्ध मानी जाती है:
- लाभ पाने वाला व्यक्ति (जैसे भतीजा/भतीजी) वसीयत बनवाने में सक्रिय भूमिका निभाए
- पति या पत्नी जैसे निकटतम वारिस को बिना वजह बाहर कर दिया जाए
- गवाहों के बयान में विरोधाभास हो
- वसीयतकर्ता की मानसिक स्थिति संदिग्ध हो
कविता कंवर बनाम पामेला मेहता (2020) केस में कोर्ट ने कहा था:
“करीबी वारिस को बाहर करने का कोई तर्कसंगत कारण नहीं दिया गया तो वसीयत पर शक होना स्वाभाविक है।”
लेकिन हर वसीयत अवैध नहीं होती
अगर कोई व्यक्ति अपने “कृतघ्न” रिश्तेदारों (जैसे भाई-बहन) को संपत्ति नहीं देना चाहता और देखभाल करने वाले जीवनसाथी या किसी अन्य को देना चाहता है, तो यह पूरी तरह वैध है।
महेश कुमार बनाम विनोद कुमार (2012) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“जो बच्चे या रिश्तेदार माता-पिता की सेवा नहीं करते, उन्हें कुछ न देना अस्वाभाविक नहीं है।”
बच्चे न होने वाले दंपतियों के लिए सलाह
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर विशेषज्ञों की राय है कि:
- वसीयत में स्पष्ट कारण लिखें कि संपत्ति किसे और क्यों दी जा रही है
- दो स्वतंत्र गवाहों से हस्ताक्षर करवाएं
- वसीयत बनवाते समय वीडियो रिकॉर्डिंग करवाएं
- पति-पत्नी मिलकर म्यूचुअल वसीयत (परस्पर वसीयत) बना सकते हैं
बिना वसीयत के क्या होता है?
हिन्दू उत्तराधिकार कानून के अनुसार, अगर बच्चे नहीं हैं और वसीयत नहीं है तो सारी संपत्ति जीवित पति या पत्नी को मिलती है। भाई-बहन या माता-पिता का कोई अधिकार नहीं बनता।
विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों से बच्चे न होने वाले दंपतियों को अपनी वसीयत बहुत सोच-समझकर और पारदर्शी तरीके से बनाने की जरूरत है, ताकि बाद में कोई कानूनी विवाद न हो।
