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देवभूमि पर मंडराता खतरा खाली गांवों में घुस रहे जंगली जानवर

उत्तराखंड के पहाड़ आज गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। एक ओर पलायन के कारण गांव खाली हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वनों की कटाई, अनियंत्रित निर्माण और तेजी से बदलते मौसम पैटर्न ने जंगली जानवरों को इंसानी बस्तियों तक पहुंचा दिया है। अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, चमोली, नैनीताल, पिथौरागढ़ और रुद्रप्रयाग के कई गांवों में शाम होते ही वन्यजीवों का साया मंडराने लगता है।

महिलाओं के लिए जंगल जाना जोखिम भरा हो गया है, किसान खेतों तक नहीं पहुंच पा रहे और बच्चे भी घर से बाहर रहने से डरते हैं। पहाड़ों में जीवन का यही बदलता चेहरा अब बड़ी चिंता बन गया है।


1. पलायन की मार: 1,792 गांव पूरी तरह खाली, लाखों घर वीरान

  • राज्य के 1,792 गांव आधिकारिक रूप से घोस्ट विलेज बन चुके हैं।
  • 3 लाख से अधिक घरों में वर्षों से ताले लटके हैं।
  • NABARD (2024-25) की रिपोर्ट: पहाड़ी जिलों का 60% कृषि क्षेत्र बंजर।

रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ग्रामीणों को मैदानों की ओर धकेल रही है। गांव खाली होते ही जंगली जानवरों के लिए इंसानी बस्तियों में प्रवेश आसान हो गया है—मानवीय गतिविधि कम होने से जंगल और गांव के बीच की प्राकृतिक सीमा लगभग टूट चुकी है।


2. वनों की कटाई + सीमेंट के जंगल = प्राकृतिक संतुलन बिगड़ा

  • इंडियन फॉरेस्ट सर्वेक्षण (2023–25): 45,000 हेक्टेयर जंगल नष्ट।
  • चारधाम सड़क परियोजना और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में 2 लाख से ज्यादा पेड़ कटे।
  • 2,500 मीटर की ऊंचाई तक होटल, रिसॉर्ट और बहुमंजिला इमारतें—सिर्फ जोशीमठ में 10 साल में 800 होटल।

सीमेंट-कंक्रीट की बेतरतीब इमारतें पहाड़ी क्षेत्रों में अर्बन हीट आइलैंड बना रही हैं, जिससे स्थानीय तापमान 4–6°C तक बढ़ रहा है। इससे भालू, तेंदुए और कई अन्य प्रजातियां ऊपरी इलाकों से नीचे गांवों की ओर खिसक रही हैं।

  • ओक और देवदार के जंगल घटने से भालुओं का प्राकृतिक भोजन खत्म।
  • लैंटाना जैसी आक्रामक प्रजातियों ने चारागाह नष्ट किए—जंगली सूअर अनियंत्रित हो चुके हैं।

3. जलवायु परिवर्तन: बारिश-बर्फ का पैटर्न बदल गया

  • दिसंबर–जनवरी में बर्फ की जगह बारिश
  • मॉनसून 18–20 दिन देर
  • एक ही दिन में 300–400 मिमी बारिश, बादल फटने की घटनाएं बढ़ीं
  • 2025 में अब तक 23 बादल फटने की घटनाएं—अधिकतर वही स्थान जहां पेड़ कटे
  • ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे, ऊपरी गांवों में पानी की भारी कमी
  • औली और मुनस्यारी जैसे क्षेत्रों का AQI 20–30 से बढ़कर 100–150

प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने के ये संकेत पहाड़ों की नाजुक भौगोलिक संरचना के लिए बड़ा खतरा हैं।


4. वन्यजीवों का आतंक: मौतें बढ़ीं, खेत उजड़े

  • 2025 में अब तक 20 मौतें, 150 से ज्यादा लोग घायल
  • पिछले 3 महीनों में 71 भालू हमले, 6 मौतें, 60 से ज्यादा पशु मरे
  • जोशीमठ: भालू गलियों में घूमते देखे गए
  • पौड़ी: ग्रामीण महिला पर भालू का हमला—गंभीर रूप से घायल
  • नैनीताल–पौड़ी: गुलदार का आतंक
  • हरिद्वार (पथरी): हाथियों ने गांव में घुसकर नुकसान पहुंचाया
  • बंदर और जंगली सूअर खेती को बर्बाद कर रहे

कई किसान खेतों को छोड़कर मजबूरन पलायन कर रहे हैं।


5. पहाड़ों की आवाज: डर, हताशा और असुरक्षा

  • जोशीमठ की महिला: “जहां घास काटते थे, वहां होटल खड़े हो गए। जंगल खत्म, सुरक्षा खत्म।”
  • पौड़ी के बुजुर्ग: “जंगल को हमने सड़क और होटल में बदल दिया। अब जंगल हमारे घर में घुस आया है।”
  • अल्मोड़ा के किसान: “जो उगाते हैं, सूअर और बंदर सब ले जाते हैं। गांव छोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं।”

इन आवाज़ों में पहाड़ों की वास्तविक पीड़ा झलकती है।


6. सरकार के प्रयास – लेकिन रफ्तार धीमी

  • मुआवजा ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख किया
  • 26 क्षेत्रों में वन पुनर्स्थापना (FLR) योजना शुरू
  • वन विभाग में स्टाफ की भारी कमी—कई रेंज में 1 गार्ड 1000 हेक्टेयर संभालता है
  • आधुनिक उपकरण, सर्विलांस, डेटा-आधारित रिसर्च की कमी
  • विशेषज्ञ युवाओं को संरक्षण परियोजनाओं से जोड़ने की वकालत कर रहे

विपक्ष इसे “सोई हुई सरकार” कह रहा है और ठोस कदमों की मांग कर रहा है।


7. भविष्य की चेतावनी

विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर

  • अनियंत्रित निर्माण,
  • वनों की कटाई,
  • और पलायन
    पर तुरंत अंकुश नहीं लगा, तो अगले दस वर्षों में उत्तराखंड के आधे से ज्यादा पहाड़ी गांव या तो पूरी तरह खाली हो जाएंगे या स्थायी रूप से वन्यजीवों के अधीन हो सकते हैं।

पहाड़ सिर्फ खाली नहीं हो रहे—वे अपनी हरियाली, पहचान और आत्मा खो रहे हैं।
और इसका कारण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मनुष्य की विकास के प्रति गलत दृष्टि और प्रकृति की अनदेखी है।

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