स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे में संदिग्ध प्रमाणपत्रों से दाखिले के बाद 8 प्रमाणपत्र निरस्त, 350–370 संदिग्ध मामलों की जांच की मांग; SIT खंगाल रही सरकारी रिकॉर्ड
देहरादून | देवभूमि के लोग | विशेष रिपोर्ट
उत्तराखंड में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए आरक्षित श्रेणियों के कथित दुरुपयोग का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर MBBS दाखिले का मामला सामने आने के बाद अब जांच का दायरा बढ़ाया जा रहा है। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद केवल स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी ही नहीं, बल्कि अन्य आरक्षित श्रेणियों के प्रमाणपत्रों की भी जांच किए जाने की बात सामने आई है। अब तक प्रशासनिक जांच में 8 प्रमाणपत्र निरस्त किए जाने की जानकारी सामने आई है।
चार छात्राओं के दाखिले रद्द, दो थानों में मुकदमे
मामला मूल रूप से उन चार छात्राओं से जुड़ा है, जिन पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित श्रेणी का कथित फर्जी प्रमाणपत्र लगाकर MBBS में प्रवेश लेने का आरोप है।
जांच में सामने आया कि चार अलग-अलग अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का स्वतंत्रता सेनानी परिचय पत्र इस्तेमाल किया गया। सरकारी रिकॉर्ड में इस नाम से संबंधित स्वतंत्रता सेनानी का रिकॉर्ड नहीं मिलने के बाद प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल उठे और दाखिले रद्द किए गए। इस संबंध में रायपुर और क्लेमेनटाउन थानों में मुकदमे दर्ज हैं।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
एक ही नाम, कई प्रमाणपत्र और अब AI फोटो का सवाल
SIT की जांच से जुड़ी रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चार अलग-अलग परिवारों से संबंधित अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों में एक ही स्वतंत्रता सेनानी का विवरण इस्तेमाल हुआ।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जांच में कम-से-कम चार प्रमाणपत्रों पर स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर की AI-generated तस्वीर होने की बात सामने आई है। यदि जांच में यह तथ्य आधिकारिक रूप से पुष्ट होता है तो यह सामान्य दस्तावेजी गलती नहीं, बल्कि तकनीक के इस्तेमाल से प्रमाणपत्र तैयार करने की संभावित गंभीर अनियमितता होगी।
फर्जी पते और दस्तावेजों ने बढ़ाया शक
SIT अब सिर्फ प्रमाणपत्र देखकर नहीं रुक रही है। टीम ने SDM कार्यालय से प्रमाणपत्र जारी करने से संबंधित फाइलें और राजस्व रिकॉर्ड अपने कब्जे में लिए हैं। संबंधित पटवारियों के बयान भी दर्ज किए गए हैं।
जांच रिपोर्टों के अनुसार, चार अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में दर्ज पते सत्यापन के दौरान फर्जी पाए गए। कुछ दस्तावेजों में अलग-अलग प्रकार के पते दर्ज होने की बात भी सामने आई है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ये पते किस आधार पर दस्तावेजों में दर्ज हुए और उनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया।
असली सवाल—फर्जी प्रमाणपत्र बना तो सरकारी सत्यापन कहां था?
यह मामला अब सिर्फ अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रह सकता।
किसी भी आरक्षित श्रेणी का प्रमाणपत्र सरकारी प्रक्रिया के कई स्तरों से गुजरता है। आवेदन, दस्तावेज, स्थानीय जांच, राजस्व रिकॉर्ड, सत्यापन और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया के बाद वही दस्तावेज मेडिकल काउंसलिंग में प्रस्तुत किया जाता है।
ऐसे में जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह होना चाहिए कि—
प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किसने किया?
किस दस्तावेज के आधार पर आवेदन स्वीकार हुआ?
स्थानीय स्तर पर सत्यापन किसने किया?
पटवारी की रिपोर्ट क्या थी?
रिपोर्ट को किस अधिकारी ने मंजूरी दी?
मेडिकल काउंसलिंग के दौरान प्रमाणपत्र की दोबारा जांच क्यों नहीं हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर दस्तावेज वास्तव में फर्जी थे तो वे सरकारी प्रक्रिया के इतने स्तर पार करके मेडिकल सीट तक कैसे पहुंच गए?
SIT फिलहाल इन्हीं कड़ियों को जोड़ने में लगी है। अधिकारियों ने संबंधित कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों से रिकॉर्ड मांगे हैं।
कितने वर्षों से चल रहा है यह खेल?
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल है।
अभी उपलब्ध जांच से यह साबित नहीं हुआ है कि ऐसा फर्जीवाड़ा कितने वर्षों से चल रहा था। लेकिन यदि जांच में यह सामने आता है कि एक से अधिक लोगों ने एक जैसी प्रक्रिया से फर्जी प्रमाणपत्र हासिल किए, तो पिछले वर्षों के रिकॉर्ड की जांच जरूरी हो जाती है।
सवाल होना चाहिए—
क्या केवल 2025-26 के दाखिलों की जांच होगी या पिछले कई वर्षों के MBBS/NEET दाखिलों का भी ऑडिट होगा?
कितने छात्रों ने स्वतंत्रता सेनानी आश्रित, स्थायी निवास या अन्य आरक्षित श्रेणी के प्रमाणपत्रों के आधार पर सीट हासिल की?
कितने प्रमाणपत्रों का वास्तविक सरकारी रिकॉर्ड मौजूद है?
कितने प्रमाणपत्रों का सत्यापन केवल कागजों के आधार पर हुआ?
और यदि किसी अपात्र व्यक्ति ने आरक्षण का लाभ लेकर MBBS में प्रवेश पाया, तो क्या उसकी आगे की शैक्षणिक यात्रा की भी जांच होगी?
350 से 370 संदिग्ध मामलों की चर्चा
मामला और बड़ा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि करीब 350–370 संदिग्ध डोमिसाइल और श्रेणी प्रमाणपत्रों की जांच की मांग सामने आई है। हालांकि इन सभी मामलों को फर्जी मानना अभी उचित नहीं होगा। इनकी वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
यानी फिलहाल यह कहना सही होगा कि संदिग्ध मामलों की संख्या चार से कहीं अधिक होने की आशंका व्यक्त की गई है, लेकिन अंतिम संख्या और दोष तय होना जांच पर निर्भर करेगा।
उत्तराखंड के आम अभ्यर्थी के हक का सवाल
मेडिकल सीट सीमित होती है। एक सीट पर कई अभ्यर्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति कथित रूप से गलत प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षित श्रेणी का लाभ हासिल करता है, तो उस सीट के वास्तविक पात्र अभ्यर्थी के अवसर पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह सिर्फ एक छात्र के दाखिले का मामला नहीं है।
यह आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता, सरकारी प्रमाणपत्र प्रणाली और मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता का सवाल है।
उत्तराखंड का वह अभ्यर्थी जो नियमों के अनुसार पात्र है, उससे यह जवाब मांगा जाना स्वाभाविक है कि अगर दस्तावेजों की जांच सही तरीके से नहीं हुई तो उसके अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
जांच सिर्फ दाखिले तक सीमित क्यों रहे?
अब सवाल यह भी है कि अगर किसी व्यक्ति ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया और बाद में उसकी योग्यता/दस्तावेज फर्जी साबित होते हैं, तो जांच केवल सीट रद्द करने तक सीमित होनी चाहिए या उसकी आगे की शैक्षणिक और पेशेवर यात्रा भी कानून के अनुसार जांच के दायरे में आनी चाहिए?
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि क्या ऐसे किसी मामले में आगे की परीक्षाएं, इंटर्नशिप, पंजीकरण या पेशेवर लाभ प्रभावित हुए।
किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना जांच और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है, लेकिन यदि फर्जीवाड़ा सिद्ध होता है तो उसके प्रभाव की पूरी श्रृंखला की जांच जरूरी है।
व्यवस्था के लिए चेतावनी
इस पूरे मामले ने प्रमाणपत्र जारी करने वाली व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाया है।
सरकार ने सभी आरक्षित श्रेणियों के प्रमाणपत्रों की जांच के निर्देश दिए हैं और SIT मामले की जांच कर रही है। यह जांच यदि केवल कुछ छात्रों तक सीमित न रहकर प्रमाणपत्र जारी होने से लेकर मेडिकल सीट मिलने तक की पूरी प्रक्रिया की जांच करती है, तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि गलती व्यक्तिगत थी या व्यवस्था के किसी स्तर पर गंभीर खामी मौजूद थी।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि फर्जी प्रमाणपत्र किसने लगाया?
सवाल यह भी है—
फर्जी प्रमाणपत्र बनाया किसने?
सत्यापन किसने किया?
सरकारी रिकॉर्ड में इसकी एंट्री कैसे हुई?
मेडिकल काउंसलिंग में इसकी जांच क्यों नहीं हुई?
कितने वर्षों के दाखिले प्रभावित हो सकते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
अगर चार मामले पकड़े गए हैं, तो क्या यह केवल चार लोगों की कहानी है या किसी बड़े नेटवर्क की शुरुआत?
SIT ने फिलहाल किसी संगठित गिरोह के बारे में निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी बताया है। इसलिए इस स्तर पर नेटवर्क का आरोप सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जांच के सवाल के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
उत्तराखंड में बड़े स्तर पर अलग अलग तरह के आरक्षण दिए जाते हैं, जिससे सामान्य सीटें न के बराबर हो चुकी है और यह भी एक कारण है कि बड़े स्तर पर फर्जी प्रमाण पत्र का खेल रहा चल रहा है।
अब चाहिए पूरी और समयबद्ध जांच
उत्तराखंड सरकार को इस प्रकरण में तीन स्तरों पर स्पष्टता सामने लानी होगी—कितने प्रमाणपत्र संदिग्ध मिले, कितने दाखिले प्रभावित हुए और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में किसकी क्या भूमिका थी।
इसके साथ पिछले वर्षों के रिकॉर्ड का नमूना-आधारित नहीं बल्कि जोखिम-आधारित विस्तृत सत्यापन, संदिग्ध प्रमाणपत्रों का डिजिटल रिकॉर्ड से मिलान और दोष सिद्ध होने पर संबंधित अभ्यर्थी तथा जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जरूरत होगी।
क्योंकि सवाल सिर्फ कुछ MBBS सीटों का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था पर भरोसे का है, जिसके आधार पर उत्तराखंड का एक सामान्य अभ्यर्थी अपनी पूरी मेहनत के साथ भविष्य की उम्मीद करता है।
यही कारण है कि व्यवस्था में सुधार नहीं दिख पा रहा है जब मूल में ही फर्जीवाड़ा है। मेहनती अभ्यर्थी बाहर हो रहे हैं और फर्जी तरीके से एंट्री करो करने वाले जगह जगह कुर्सी पर बैठ गए हैं जिससे तंत्र की हालत गंभीर हो चुकी है।

