डेढ़ महीने में ऋषिकेश-मुनिकीरेती क्षेत्र में चार मौतें, जुलाई में 9 साल की बच्ची और लाइनमैन की मौत; खटीमा व पौड़ी की घटनाओं ने भी सुरक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल
उत्तराखंड | विशेष जांच रिपोर्ट | देवभूमि के लोग न्यूज़
उत्तराखंड में मानसून के साथ बिजली का करंट भी लोगों के लिए जानलेवा खतरा बनता जा रहा है। ऋषिकेश में मां-बेटी की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर विद्युत सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ऋषिकेश और मुनिकीरेती क्षेत्र में करीब डेढ़ महीने में तीन अलग-अलग घटनाओं में चार लोगों की करंट लगने से मौत हुई है।
लेकिन सवाल केवल ऋषिकेश का नहीं है। पिछले करीब एक वर्ष में उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से बिजली के तार, पोल, ट्रांसफॉर्मर और विद्युत लाइनों से जुड़े कई गंभीर हादसे सामने आए हैं।
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर बड़ा सवाल सामने आता है—
क्या उत्तराखंड में विद्युत सुरक्षा व्यवस्था हादसे के बाद जागती है, या हादसे से पहले भी कोई प्रभावी निगरानी व्यवस्था मौजूद है?
ऋषिकेश: डेढ़ महीने में चार मौतें
ऋषिकेश के खदरी क्षेत्र में बारिश के दौरान बिजली की टूटी तार की चपेट में आने से एक महिला और उसकी दो वर्षीय बेटी की मौत की घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया।
रिपोर्टों के मुताबिक दोनों बारिश के दौरान रास्ते से गुजर रही थीं और टूटे विद्युत तार से संपर्क में आने के बाद करंट की चपेट में आ गईं।
इस घटना के साथ पिछले लगभग डेढ़ महीने में ऋषिकेश-मुनिकीरेती क्षेत्र में करंट से मौतों का आंकड़ा चार तक पहुंचने की बात सामने आई है।
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ऋषिकेश एक प्रमुख पर्यटन और तीर्थ क्षेत्र है, जहां मानसून में भी बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक और पर्यटक आवाजाही करते हैं।
15 जुलाई: आस्था पथ पर 9 साल की बच्ची की मौत
ऋषिकेश में इससे पहले जुलाई में आस्था पथ पर बारिश के दौरान विद्युत पोल में करंट उतरने से नौ वर्षीय बच्ची की मौत की रिपोर्ट सामने आई थी।
यह घटना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि बिजली का खतरा केवल खुले तार तक सीमित नहीं है।
विद्युत पोल + पानी + खराब अर्थिंग = जानलेवा स्थिति
बारिश में पोल, स्ट्रीट लाइट और धातु की संरचनाएं भी खतरा बन सकती हैं।
22 जुलाई: लाइन ठीक करते समय आउटसोर्स लाइनमैन की मौत
ऋषिकेश के ISBT क्षेत्र में फॉल्ट ठीक करने के दौरान एक आउटसोर्स लाइनमैन की करंट लगने से मौत हुई।
प्रारंभिक जांच में अधिकारियों की ओर से बैक करंट को हादसे का कारण बताया गया था।
यह घटना आम लोगों से अलग एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—
जब प्रशिक्षित लाइनमैन ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है?
लाइनमैन के लिए शटडाउन, लॉकआउट-टैगआउट, टेस्टिंग, अर्थिंग और सुरक्षा उपकरण जैसी प्रक्रियाएं जीवन-मृत्यु का प्रश्न हैं।
खटीमा: ट्रांसफॉर्मर पर काम कर रहे लाइनमैन की मौत
9 जून 2026 को खटीमा के अमरकला क्षेत्र में ट्रांसफॉर्मर की मरम्मत के दौरान एक लाइनमैन की करंट लगने से मौत हो गई।
घटना के बाद परिजनों ने आरोप लगाया कि काम के दौरान उचित शटडाउन नहीं लिया गया था और उन्होंने कार्रवाई की मांग की।
यह आरोप जांच का विषय है, लेकिन घटना स्वयं एक गंभीर सुरक्षा प्रश्न खड़ा करती है:
क्या हर फील्ड कर्मचारी को काम शुरू करने से पहले विद्युत लाइन वास्तव में डी-एनर्जाइज होने की स्वतंत्र पुष्टि मिलती है?
पौड़ी रिखणीखाल: संविदा लाइनमैन की मौत और तीन UPCL अधिकारियों पर कार्रवाई
18 जून 2025 को रिखणीखाल क्षेत्र के वड्डाखाल में विद्युत लाइन पर काम करते समय संविदा लाइनमैन अनिल नेगी की करंट लगने से मौत हो गई।
रिपोर्ट के मुताबिक उनका शव कई घंटे तक तारों के बीच फंसा रहा। ग्रामीणों ने ऊर्जा निगम के अधिकारियों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए विरोध किया।
घटना के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर UPCL के तीन अधिकारियों के निलंबन की कार्रवाई की गई। सरकार की ओर से कर्मचारियों की सुरक्षा को प्राथमिकता बताते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की बात कही गई।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक गंभीर हादसे के बाद जवाबदेही तय करने की कार्रवाई हुई।
लेकिन सवाल है—
क्या हर हादसे के बाद अधिकारी निलंबित होंगे, या ऐसी व्यवस्था बनेगी कि हादसे ही न हों?
सिर्फ जनता ही नहीं, UPCL के कर्मचारी भी खतरे में
बिजली विभाग में काम करने वाले लाइनमैन, हेल्पर और आउटसोर्स कर्मचारी सबसे अधिक जोखिम वाले कार्यों में लगे होते हैं।
वे पोल पर चढ़ते हैं, ट्रांसफॉर्मर पर काम करते हैं, टूटे तारों को ठीक करते हैं और बारिश, गर्मी तथा पहाड़ी परिस्थितियों में विद्युत आपूर्ति बहाल करते हैं।
इसलिए सुरक्षा के नाम पर केवल हेलमेट और दस्ताने पर्याप्त नहीं हैं।
जरूरी है:
सही शटडाउन → लाइन टेस्टिंग → अर्थिंग → परमिट टू वर्क → PPE → प्रशिक्षित कर्मचारी → सुपरविजन → बैक-फीड रोकने की व्यवस्था।
और अब भ्रष्टाचार का सवाल—क्या सुरक्षा और रिश्वत का कोई संबंध है?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
पूरे UPCL को भ्रष्ट कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
लेकिन UPCL/ऊर्जा विभाग से जुड़े भ्रष्टाचार के दर्ज मामले यह जरूर दिखाते हैं कि विभागीय प्रक्रियाओं में रिश्वतखोरी का जोखिम मौजूद है।
देहरादून: बिजली कनेक्शन के नाम पर ₹80 हजार की रिश्वत
17 मार्च 2026 को देहरादून में विजिलेंस ने बिजली विभाग के एक जूनियर इंजीनियर को ₹80,000 की कथित रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया।
रिपोर्ट के मुताबिक बिजली कनेक्शन जारी करने और विद्युत भार बढ़ाने के नाम पर रकम मांगी गई थी। शिकायत की पुष्टि के बाद विजिलेंस ने ट्रैप कार्रवाई की।
यह सिर्फ एक रिश्वत का मामला नहीं है। UPCL में बड़े स्तर पर धांधली से हुई भर्तियों की बात बार बार सामने आती है जहां पैसे देकर कई लोगों ने बड़े बड़े पदों पर नियुक्तियां पाई हैं किंतु जांच नहीं हो सकी है। सोशल मीडिया में बड़े स्तर पर एक ही परिवार के कई सदस्य इस विभाग में नियुक्ति पाए हैं, जिसकी जांच होनी बाक़ी है। जब भ्रष्ट माध्यमों से ही नौकरी लगी होगी तो कैसे विभाग में बेहतर कार्य हो सकेंगे और पारदर्शिता आएगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल था है।
यह सवाल पूछता है—
अगर सामान्य बिजली कनेक्शन या लोड बढ़ाने जैसे वैधानिक काम के लिए रिश्वत मांगी जाए तो आम उपभोक्ता कहां जाए?
भ्रष्टाचार केवल पैसे लेने तक सीमित नहीं—सिस्टम की गुणवत्ता भी सवालों में
विद्युत व्यवस्था में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा खतरा केवल रिश्वत लेना नहीं है।
यदि कहीं:
- घटिया गुणवत्ता का सामान लगाया जाए,
- पुराने तार समय पर न बदले जाएं,
- जर्जर पोल को रिकॉर्ड में ठीक दिखाया जाए,
- सुरक्षा निरीक्षण केवल कागजों में हो,
- ठेकेदार के काम का वास्तविक निरीक्षण न हो,
- कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण न दिए जाएं,
- शिकायतों को समय पर बंद न किया जाए,
तो इसका अंतिम नुकसान जनता को उठाना पड़ता है।
लेकिन इन सभी बिंदुओं को किसी विशेष घटना में भ्रष्टाचार कहना तभी उचित होगा जब जांच या दस्तावेज उसका प्रमाण दें।
सरकारी व्यवस्था पर एक और सवाल: वितरण हानि और बिजली चोरी
फरवरी 2026 में मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में विद्युत वितरण हानि को न्यूनतम करने और बिजली चोरी पर सख्ती से रोक लगाने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही वितरण हानि में लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई की बात कही गई।
इससे स्पष्ट है कि सरकार के स्तर पर भी distribution losses और बिजली चोरी को गंभीर समस्या माना गया है।
अब जरूरत है कि इन आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाए:
किस जिले में कितनी बिजली चोरी?
कितना लाइन लॉस?
कितनी शिकायतें?
कितने जर्जर पोल?
कितने तार बदले गए?
कितने अधिकारियों पर कार्रवाई?
कितने सुरक्षा निरीक्षण हुए?
जनता को जवाब चाहिए।
UPCL के सामने पांच बड़े सवाल
1. मानसून से पहले विद्युत सुरक्षा ऑडिट कहां है?
हर जिले के संवेदनशील क्षेत्रों की सूची सार्वजनिक होनी चाहिए।
2. टूटे तार की शिकायत पर बिजली कितनी देर में बंद होती है?
Emergency response time सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
3. आउटसोर्स कर्मचारियों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करता है?
जिस एजेंसी के माध्यम से कर्मचारी लगाए गए हैं, उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
4. हादसे के बाद जिम्मेदारी किसकी तय होती है?
केवल मुआवजा पर्याप्त नहीं। यदि मानवीय/प्रशासनिक लापरवाही सिद्ध हो तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
5. भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले उपभोक्ता सुरक्षित हैं या नहीं?
हर उपभोक्ता को रिश्वत दिए बिना कनेक्शन, लोड परिवर्तन और शिकायत समाधान की पारदर्शी व्यवस्था मिलनी चाहिए।
देवभूमि में बिजली सुरक्षा को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ क्यों जरूरी?
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य राज्यों से अलग हैं।
यहां:
पहाड़ + बारिश + भूस्खलन + पेड़ों का गिरना + पुराने विद्युत पोल + दूरदराज के गांव + कठिन पहुंच
विद्युत नेटवर्क को अतिरिक्त जोखिम में डालते हैं।
इसलिए मैदानी राज्यों जैसी सामान्य व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती।
उत्तराखंड को मानसून आधारित विद्युत सुरक्षा मॉडल की आवश्यकता है।
जनता के लिए जरूरी सावधानियां
⚠️ टूटे बिजली तार से कम से कम कई मीटर दूर रहें
उसे लकड़ी, लोहे या किसी वस्तु से हटाने की कोशिश न करें।
⚠️ पानी में पड़ा तार सबसे बड़ा खतरा
जलभराव वाले स्थान पर बिजली का तार गिरा हो तो पानी में प्रवेश न करें।
⚠️ बिजली के पोल को न छुएं
खासकर बारिश के दौरान।
⚠️ बच्चों को बिजली के पोल और ट्रांसफॉर्मर से दूर रखें
बारिश में यह खतरा और बढ़ जाता है।
⚠️ घर में पानी भर जाए तो खुद बिजली चालू न करें
पहले विद्युत आपूर्ति सुरक्षित रूप से बंद करवाएं।
⚠️ करंट लगे व्यक्ति को सीधे न छुएं
पहले बिजली का स्रोत बंद करवाएं और प्रशिक्षित सहायता/आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।
सबसे बड़ा सवाल: क्या हर मौत के बाद ही व्यवस्था जागेगी?
ऋषिकेश में मां-बेटी की मौत।
आस्था पथ पर मासूम बच्ची की मौत।
ऋषिकेश में लाइनमैन की मौत।
खटीमा में लाइनमैन की मौत।
पौड़ी रिखणीखाल में संविदा लाइनमैन की मौत।
और इनके बीच सामने आया बिजली कनेक्शन के नाम पर ₹80 हजार रिश्वत का मामला।
ये घटनाएं अलग-अलग हो सकती हैं, इनके कारण भी अलग हो सकते हैं—लेकिन इन सबके बीच एक साझा मुद्दा जरूर है:
विद्युत व्यवस्था में सुरक्षा, निगरानी और जवाबदेही।
हादसा होने के बाद मुआवजा देना जरूरी है।
लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है—
हादसा होने से पहले खतरे को पहचानना।
तार टूटने से पहले उसे बदलना।
पोल में करंट आने से पहले अर्थिंग जांचना।
लाइनमैन के पोल पर चढ़ने से पहले शटडाउन सुनिश्चित करना।
और रिश्वत की शिकायत आने के बाद नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था बनाकर भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म करना।
देवभूमि के लोग न्यूज़ का सवाल सीधा है:
अगर बिजली व्यवस्था का उद्देश्य लोगों के घरों में रोशनी पहुंचाना है, तो वही बिजली लोगों के लिए मौत का कारण क्यों बन रही है?
अब समय हादसों की सूची बनाने का नहीं, जवाबदेही की सूची बनाने का है।
UPCL को जिला-वार विद्युत सुरक्षा ऑडिट, हादसों का डेटा, लंबित शिकायतें, जर्जर पोल/तारों की संख्या, सुरक्षा निरीक्षण और कार्रवाई की रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।
क्योंकि बिजली जरूरी है—लेकिन जिंदगी उससे भी ज्यादा जरूरी है।
— देवभूमि के लोग न्यूज़ | Voice of Hills

