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सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए आरक्षण संबंधी अपने आदेश पर आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट करने वाले एक वकील के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू

कोर्ट ने दिल्ली के रोहिणी जिला अदालत में प्रैक्टिस करने वाले वकील विभास कुमार झा को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने उनसे पूछा है कि उनकी वकालत की लाइसेंस क्यों नहीं रद्द कर दी जानी चाहिए और उन्हें वकालत करने से क्यों नहीं रोका जाना चाहिए।

क्या था विवाद?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्य बार काउंसिलों और बार एसोसिएशन्स में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने का महत्वपूर्ण आदेश दिया था। इस आदेश की आलोचना करते हुए विभास कुमार झा ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला, जिसमें महिलाओं और अनुसूचित जातियों के सदस्यों के खिलाफ आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां की गईं। साथ ही, उन्होंने शीर्ष अदालत के आदेश और उसकी गरिमा पर भी derogatory भाषा का इस्तेमाल किया।

उस पोस्ट को अब डिलीट कर दिया गया है, लेकिन कोर्ट की नजर उस पर पड़ गई।

कोर्ट की सख्ती

30 अप्रैल 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया। पीठ ने वकील को शो-कॉज नोटिस जारी करते हुए साफ कहा कि वे इस मामले में पूरी तरह सहयोग करें।

मुख्य न्यायाधीश ने सीधे वकील से पूछा, “आपकी बार लाइसेंस क्यों नहीं रद्द की जानी चाहिए और आपको वकील के रूप में प्रैक्टिस करने से क्यों नहीं रोका जाना चाहिए?”

कोर्ट ने आगे चेतावनी दी कि अगर वकील सहयोग नहीं करते तो उनके खिलाफ बेलेबल वारंट जारी किए जा सकते हैं। साथ ही, अगली सुनवाई में वकील को अपना मूल लॉ डिग्री रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया गया है ताकि उनकी योग्यता की जांच की जा सके।

क्यों मायने रखता है यह मामला?

यह घटना वकीलों द्वारा सोशल मीडिया पर अदालत के फैसलों और न्यायिक नीतियों की आलोचना के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट की बढ़ती नजर रखने को दर्शाती है। खासकर जब ऐसी टिप्पणियां महिलाओं को न्यायिक क्षेत्र में समान अवसर देने वाली नीतियों (जैसे जेंडर पैरिटी) और सामाजिक समावेश को कमजोर करने वाली हों।

कोर्ट बार-बार यह संदेश दे रहा है कि अदालत के अधिकारियों (वकीलों) को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते हुए अदालत की गरिमा, न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करना चाहिए।

अभी मामले की अगली सुनवाई का इंतजार है, जहां वकील को अपना जवाब पेश करना होगा। इस घटना ने कानूनी समुदाय में चर्चा छेड़ दी है कि सोशल मीडिया पर व्यक्त की जाने वाली राय कितनी सीमा में होनी चाहिए, खासकर जब वह अदालत के फैसलों से जुड़ी हो।

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