नई दिल्ली, 31 मार्च 2026 By- B P Singh– देश में दिल के दौरे का खतरा अब सामान्य स्वास्थ्य जांच और रिस्क असेसमेंट टेस्ट्स से भी छिपा रह रहा है। एक प्रमुख अध्ययन में पता चला है कि 80% भारतीय जो पहला दिल का दौरा झेलते हैं, उन्हें पहले स्टैंडर्ड मेडिकल कैलकुलेटर्स में हाई-रिस्क नहीं माना गया था। ये लोग डॉक्टरों की नजर में कम या मध्यम जोखिम वाले थे, लेकिन अचानक बिना किसी चेतावनी के उन्हें हार्ट अटैक हो गया।
दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में किए गए रेट्रोस्पेक्टिव अध्ययन में 5000 से अधिक भारतीय मरीजों का विश्लेषण किया गया। नतीजे हैरान करने वाले हैं – विभिन्न ग्लोबल हार्ट रिस्क मॉडल्स में केवल 11% से 20% मरीजों को ही हाई-रिस्क कैटेगरी में रखा गया था, जबकि सभी मरीजों को बाद में दिल का दौरा पड़ चुका था। मरीजों की औसत उम्र मात्र 54 वर्ष थी, जो दर्शाता है कि भारत में हृदय रोग पहले की उम्र में ही अपना असर दिखा रहा है।
यह अध्ययन वैश्विक हार्ट रिस्क कैलकुलेटर्स की सीमाओं को उजागर करता है। डॉ. मोहित दयाल गुप्ता ने कहा, “भारतीय मरीज और आबादी पूरी तरह अलग तरीके से व्यवहार करते हैं। हमारे पास अलग रिस्क फैक्टर्स हैं, अलग पैटर्न हैं, इसलिए वेस्टर्न स्कोर्स हमेशा उपयुक्त नहीं हो सकते।”
क्यों सामान्य रिपोर्ट्स के बावजूद दिल का दौरा?
विश्व स्तर पर इस्तेमाल होने वाले हार्ट रिस्क कैलकुलेटर्स मुख्य रूप से पश्चिमी आबादी पर आधारित हैं, जहां हृदय रोग आमतौर पर बाद की उम्र में होता है। भारत में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां हार्ट अटैक युवावस्था में ही आम हो गया है और इसके पीछे “साउथ एशियन फेनोटाइप” नामक एक खास पैटर्न काम करता है।
मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस: कई भारतीय सामान्य वजन पर भी डायबिटीज या इंसुलिन रेसिस्टेंस से ग्रस्त होते हैं। यह जोखिम BMI आधारित आकलन में अक्सर छूट जाता है।
- कोलेस्ट्रॉल का misleading पैटर्न: भारतीयों में LDL कोलेस्ट्रॉल ज्यादा ऊंचा नहीं दिखता, लेकिन HDL कम और ट्राइग्लिसराइड्स ज्यादा होते हैं। इससे जोखिम का सही आंकलन नहीं हो पाता।
- छिपा हुआ पेट का मोटापा (Central Obesity): कई लोग बाहरी रूप से दुबले दिखते हैं, लेकिन उनके पेट में छिपा फैट (Visceral Fat) हार्ट अटैक का बड़ा कारण बनता है। सामान्य BMI टेस्ट इसे पकड़ नहीं पाते।
- अन्य छूटे हुए फैक्टर्स: Lipoprotein(a), ApoB, क्रॉनिक किडनी डिजीज, स्मोकिंग, साइकोसोशल स्ट्रेस (तनाव) और डिस्लिपिडेमिया जैसे पारंपरिक रिस्क फैक्टर्स के साथ ये नए पैटर्न जुड़ जाते हैं।
वेस्टर्न मॉडल्स मुख्य रूप से उम्र और LDL कोलेस्ट्रॉल पर ज्यादा निर्भर करते हैं, जिससे युवा भारतीयों में जोखिम को कम आंका जाता है। नतीजतन कई मरीज “इंटरमीडिएट रिस्क” कैटेगरी में आ जाते हैं, जहां प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट में देरी हो जाती है।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- 80% मरीज हाई-रिस्क नहीं बताए गए थे।
- सभी मॉडल्स में केवल 11%-20% को हाई-रिस्क माना गया।
- औसत उम्र: 54 वर्ष (वैश्विक औसत से करीब एक दशक पहले)।
- भारतीय आबादी ग्लोबल डेटासेट्स में कम प्रतिनिधित्व वाली है, इसलिए वेस्टर्न स्कोर्स भारतीय पैटर्न को कैप्चर नहीं कर पाते।
- कई बार अलग-अलग मॉडल्स एक ही मरीज के लिए अलग-अलग रिस्क बताते हैं, जिससे डॉक्टरों को कन्फ्यूजन होता है।
डॉ. गुप्ता ने जोर दिया कि भारतीय मरीजों में रिस्क पैटर्न अलग है। यहां हार्ट डिजीज जल्दी शुरू होती है, डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस सामान्य वजन पर भी मौजूद रहते हैं, और कोलेस्ट्रॉल का प्रोफाइल पश्चिमी लोगों से अलग होता है।
भारत में हार्ट अटैक का बढ़ता खतरा: आंकड़े और वास्तविकता
भारत में हृदय रोग अब महामारी का रूप ले चुका है। युवा पीढ़ी में भी यह आम हो गया है। अध्ययन बताता है कि स्टैंडर्ड टेस्ट्स (जैसे लिपिड प्रोफाइल, ब्लड शुगर, BMI आदि) सामान्य आने के बावजूद कई लोग अचानक हार्ट अटैक का शिकार हो जाते हैं।
कारणों में बदलता जीवनशैली, तनावपूर्ण जॉब, अनियमित खान-पान, कम शारीरिक गतिविधि, प्रदूषण और जेनेटिक फैक्टर्स शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीयों में “थिन फैट” फेनोटाइप आम है – यानी शरीर दुबला, लेकिन अंदरूनी अंगों पर फैट जमा।
विशेषज्ञों की सलाह: क्या करें भारतीय?
यह अध्ययन भारत-विशेष रिस्क स्कोर विकसित करने की मांग को मजबूत करता है। डॉक्टरों को अब केवल वेस्टर्न कैलकुलेटर्स पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
जरूरी सुझाव:
- एडवांस्ड टेस्टिंग: Lipoprotein(a), ApoB, Hs-CRP, इंसुलिन रेसिस्टेंस टेस्ट, इकोकार्डियोग्राफी और CT एंजियोग्राफी जैसी जांचों पर ज्यादा ध्यान दें।
- लाइफस्टाइल बदलाव: नियमित व्यायाम, संतुलित आहार (कम तेल-मसाले, ज्यादा फल-सब्जियां), वजन नियंत्रण, तनाव प्रबंधन और धूम्रपान छोड़ना।
- डायबिटीज कंट्रोल: सामान्य वजन पर भी ब्लड शुगर और इंसुलिन लेवल चेक करवाएं।
- पेट के मोटापे पर फोकस: कमर का माप (Waist Circumference) BMI से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
- नियमित स्क्रीनिंग: 30 वर्ष से ऊपर के हर व्यक्ति को साल में एक बार हार्ट चेकअप करवाना चाहिए, खासकर परिवार में हार्ट डिजीज का इतिहास हो तो।
- डॉक्टरों के लिए: रिस्क असेसमेंट में भारतीय पैटर्न को शामिल करें और इंटरमीडिएट रिस्क वाले मरीजों को भी प्रिवेंटिव दवाएं (स्टैटिन आदि) पर विचार करें।
भारत के लिए क्या मतलब?
यह अध्ययन भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़े चेतावनी का संकेत है। अगर हम अभी भी पुराने वेस्टर्न मॉडल्स पर निर्भर रहे, तो युवा भारतीयों में हार्ट अटैक के मामलों में और बढ़ोतरी हो सकती है। सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय और मेडिकल सोसाइटीज को भारत-केंद्रित रिस्क स्कोर विकसित करने और जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
डॉक्टरों का कहना है कि “सामान्य रिपोर्ट” का मतलब हमेशा सुरक्षित नहीं होता। खासकर भारतीयों में छिपे जोखिम को समझना और समय पर एक्शन लेना जरूरी है।
सावधानी की आवश्यकता
80% भारतीयों को सामान्य टेस्ट्स के बाद भी दिल का दौरा पड़ना एक गंभीर मुद्दा है। यह दर्शाता है कि हमारी स्वास्थ्य जांच प्रणाली को भारतीय शरीर और जीवनशैली के अनुरूप अपडेट करने की जरूरत है।
हर व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य स्थिति को गंभीरता से लेना चाहिए। अगर परिवार में हार्ट अटैक का इतिहास है, डायबिटीज है, तनाव ज्यादा है या धूम्रपान की आदत है, तो डॉक्टर से एडवांस्ड स्क्रीनिंग जरूर करवाएं।
स्वास्थ्य जागरूकता और समय पर रोकथाम से लाखों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। भारत में प्रीमैच्योर हार्ट डिजीज को रोकने के लिए अब तत्काल कदम उठाने होंगे।
यह रिपोर्ट जीबी पंत अस्पताल के अध्ययन और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बयानों पर आधारित है। नागरिकों से अपील है कि वे डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें और नियमित स्वास्थ्य जांच करवाते रहें।
(यह विस्तृत समाचार रिपोर्ट मुख्य तथ्यों, आंकड़ों और विशेषज्ञ विश्लेषण पर आधारित है। हार्ट अटैक के लक्षण दिखने पर तुरंत मेडिकल मदद लें – हर सेकंड मायने रखता है।)

