नैनीताल/देहरादून, 3 अप्रैल 2026 – उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नाबालिगों (किशोर-किशोरियों) के सहमति वाले रिश्तों पर एक बड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति अलोक मेहरा की एकल पीठ ने एक मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB), देहरादून के समक्ष लंबित कार्यवाही को स्थगित कर दिया और स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायिक प्रणाली को नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी स्वायत्तता (autonomy) को भी मान्यता देनी चाहिए। अदालत ने कहा, “किशोरावस्था के सहज आकर्षण और आपराधिक कृत्य के मध्य के अंतर को समझना न्याय के हित में अनिवार्य है।” यह फैसला न सिर्फ एक केस का समाधान है, बल्कि पूरे देश में POCSO एक्ट के कठोर प्रावधानों, किशोर प्रेम की वास्तविकता और कानूनी सुधार की जरूरत पर गंभीर बहस छेड़ने वाला है।
मामले की पृष्ठभूमि: 15 वर्षीय किशोर-किशोरी का 4 वर्ष पुराना सहमति वाला रिश्ता
मामला देहरादून का है। एक नाबालिग लड़की के पिता ने किशोर (लगभग 15 वर्षीय) पर अपनी बेटी का अपहरण करने का आरोप लगाकर FIR दर्ज कराई। पुलिस जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई। आरोपी किशोर (याचिकाकर्ता) ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि दोनों किशोर 4 वर्ष से प्रेम संबंध में थे। रिश्ता पूरी तरह सहमति पर आधारित था। लड़की ने BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में स्वीकार किया कि वह खुद लड़के के घर गई, उसे अपने घर बुलाया, अलमारी में छिपाया, खाना खिलाया और शारीरिक संबंध सहमति से बनाए। मेडिकल रिपोर्ट में जबरदस्ती या संघर्ष का कोई सबूत नहीं मिला।
न्यायमूर्ति अलोक मेहरा ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालय को संवेदनशीलता और दूरदृष्टि से काम लेना चाहिए। अदालत ने JJB की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी और अगली सुनवाई तक नोटिस जारी किया। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम अनिरुद्ध एवं अन्य (2026) के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें सहमति और आपसी स्नेह वाले रिश्तों को बेल और मुकदमे में ध्यान में रखने की बात कही गई थी।
नाबालिगों के रिश्तों पर भारत के कानून: POCSO, IPC और JJ एक्ट की कठोरता
भारत में नाबालिगों (18 वर्ष से कम उम्र) के यौन संबंधों को नियंत्रित करने वाले मुख्य कानून निम्नलिखित हैं:
- POCSO एक्ट, 2012 (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट): यह कानून बच्चों (18 वर्ष से कम) की यौन शोषण से सुरक्षा के लिए बना। धारा 2(1)(d) में “चाइल्ड” को 18 वर्ष से कम परिभाषित किया गया। धारा 3 (पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) और धारा 4 (सजा) के तहत 18 वर्ष से कम उम्र की किसी भी लड़की/लड़के के साथ यौन संबंध – चाहे सहमति हो या नहीं – अपराध है। सहमति कानूनी रूप से अमान्य मानी जाती है। न्यूनतम सजा 7-10 वर्ष कैद और जुर्माना।
- IPC की धारा 375 (बलात्कार): 2013 के क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट के बाद 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध को बलात्कार माना जाता है, भले ही सहमति हो। विवाह अपवाद (exception 2) को सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले में रद्द कर दिया, जिसमें नाबालिग पत्नी के साथ संबंध को भी बलात्कार घोषित किया गया।
- जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015: 16-18 वर्ष के किशोरों को “चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ” माना जाता है। POCSO मामलों में उन्हें ऑब्जर्वेशन होम भेजा जा सकता है, लेकिन गंभीर अपराध में वयस्क की तरह ट्रायल संभव।
- BNSS (नई CrPC) धारा 183: पीड़ित/गवाह के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया, जिसका इस मामले में महत्वपूर्ण उपयोग हुआ।
ये कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बने, लेकिन किशोर प्रेम (adolescent romance) में इनका दुरुपयोग हो रहा है। एनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट की स्टडी के अनुसार, POCSO के “रोमांटिक केस” में 80% से ज्यादा शिकायतें माता-पिता द्वारा दाखिल की जाती हैं – अक्सर इंटर-कास्ट, इंटर-रिलीजियन या परिवार विरोधी रिश्तों में।
यह फैसला क्यों ऐतिहासिक और बड़ा? मुद्दे को संबोधित करने की आवश्यकता क्यों?
उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला इसलिए मील का पत्थर है क्योंकि यह पहली बार स्पष्ट रूप से कह रहा है कि न्यायालय को “सुरक्षा और स्वायत्तता” के बीच सूक्ष्म संतुलन बनाना चाहिए। अदालत ने किशोरावस्था की जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक वास्तविकता को स्वीकार किया – जहां यौन आकर्षण प्राकृतिक विकास का हिस्सा है। अगर हर सहमति वाले रिश्ते को अपराध माना जाए तो हजारों किशोरों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा – ऑब्जर्वेशन होम, क्रिमिनल रिकॉर्ड, शिक्षा छूटना, सामाजिक कलंक।
मुद्दे को संबोधित करने की जरूरत इसलिए है क्योंकि:
- दुरुपयोग: POCSO को “ऑनर किलिंग” या परिवार नियंत्रण का हथियार बनाया जा रहा है। माता-पिता लड़की की सहमति वाले रिश्ते को “अपहरण” या “बलात्कार” बताकर FIR दर्ज कराते हैं।
- कम दोषसिद्धि दर: 2018-2022 के बीच POCSO में 16-18 वर्ष के किशोरों पर 6892 केस दर्ज, लेकिन सिर्फ 12% दोषसिद्धि। जेल भेजने से पहले ही जीवन प्रभावित।
- किशोर मनोविज्ञान: WHO और UNICEF के अनुसार, 12-18 वर्ष उम्र में यौन जिज्ञासा सामान्य है। कठोर कानून इसे दबाता है, लेकिन रोक नहीं पाता।
- कोर्टों पर बोझ: हजारों केस जुवेनाइल बोर्ड और POCSO कोर्ट में लंबित, असली शोषण के केस प्रभावित।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: POCSO में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 के स्टेट ऑफ यूपी बनाम अनुरुद्ध कुमार एवं अन्य फैसले में POCSO के दुरुपयोग पर चिंता जताई। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि “रोमियो-जूलियट क्लॉज” (close-in-age exemption) पर विचार करें – यानी 2-3 वर्ष के आयु अंतर वाले किशोरों के सहमति वाले रिश्तों को अपराध से मुक्त किया जाए। कोर्ट ने कहा कि POCSO बच्चों की रक्षा के लिए है, न कि किशोर प्रेम को अपराधी बनाने के लिए।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी नवतेज सिंह जोहर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) में यौन स्वायत्तता को मौलिक अधिकार माना। इंडिपेंडेंट थॉट (2017) में नाबालिग पत्नी के साथ संबंध को बलात्कार घोषित किया, लेकिन किशोर-किशोरी के बीच अंतर स्पष्ट किया। नवंबर 2025 में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की बेंच ने कहा कि POCSO को किशोर रिश्तों में दुरुपयोग हो रहा है – लड़कों को जेल भेजने की बजाय जागरूकता और काउंसलिंग जरूरी।
अन्य महत्वपूर्ण केस लॉ और कानूनी समस्याएं
- बॉम्बे हाईकोर्ट (2023): POCSO का उद्देश्य रोमांटिक रिश्तों को सजा देना नहीं, बल्कि शोषण रोकना है।
- मद्रास हाईकोर्ट: कई फैसलों में सहमति वाले किशोर रिश्तों को POCSO से बाहर रखा, कहा कि कानून “किशोरों को अपराधी” नहीं बनाना चाहता।
- दिल्ली, कर्नाटक, मेघालय हाईकोर्ट: “रोमांटिक केस” में POCSO के कठोर इस्तेमाल पर सवाल उठाए।
- कलकत्ता हाईकोर्ट: कुछ टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, लेकिन POCSO में सहमति को अपवाद नहीं माना।
समस्याएं:
- ओवर-क्रिमिनलाइजेशन: 16-18 वर्ष के किशोरों को “चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट” बनाकर जेल भेजना उनके विकास को रोकता है।
- जेंडर बायस: ज्यादातर लड़के आरोपी बनते हैं।
- सामाजिक प्रभाव: इंटर-कास्ट/रिलीजन रिश्तों में POCSO का हथियार।
- कानूनी विरोधाभास: JJ एक्ट में किशोरों को वयस्क मानकर ट्रायल, लेकिन POCSO में सहमति नहीं मानना।
- कम सजा दर: 9-12% दोषसिद्धि, लेकिन गिरफ्तारी और स्टिग्मा स्थायी।
कानूनी सुधार की जरूरत और समाधान
POCSO 2012 का उद्देश्य शोषण रोकना था, न कि किशोरों की सामान्य विकास प्रक्रिया को दंडित करना। अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा में “रोमियो-जूलियट” या close-in-age exemption है (आयु अंतर 2-4 वर्ष)।
समाधान सुझाव:
- रोमियो-जूलियट क्लॉज: POCSO और IPC में संशोधन – 16-18 वर्ष के बीच, 2-3 वर्ष आयु अंतर, सहमति और कोई शोषण न हो तो अपराध मुक्त।
- काउंसलिंग और पुनर्वास: JJB में अनिवार्य काउंसलिंग, सेक्स एजुकेशन, परिवार मध्यस्थता।
- जागरूकता: स्कूलों में कानूनी शिक्षा, माता-पिता को जिम्मेदार बनाना।
- डेटा आधारित समीक्षा: लॉ कमीशन या संसदीय समिति POCSO की समीक्षा करे।
- न्यायिक दिशानिर्देश: सुप्रीम कोर्ट की तरह हाईकोर्ट पीठें भी “सहमति, आयु अंतर, इरादा” पर विचार करें।
- लिंग-तटस्थ और विकासोन्मुखी कानून: किशोरों की “evolving capacities” (UNCRC) को मान्यता।
सुरक्षा और स्वतंत्रता का संतुलन जरूरी
उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला POCSO के कठोर दायरे में एक महत्वपूर्ण छेद है। यह याद दिलाता है कि कानून बच्चों की रक्षा करे, लेकिन किशोरों को अपराधी न बनाए। सुप्रीम कोर्ट ने संसद से सुधार की अपील की है। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार सेक्स एजुकेशन अनिवार्य करे और न्यायिक प्रक्रिया को मानवीय बनाए। वरना हम हजारों किशोरों का भविष्य कुचलते रहेंगे, जबकि असली शोषणकर्ता बचते रहेंगे।
यह फैसला न सिर्फ कानूनी, बल्कि सामाजिक-मनोवैज्ञानिक बदलाव का संकेत है। कानून को इस वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए – सुरक्षा के नाम पर स्वायत्तता का हनन न हो।
(यह विस्तृत समाचार रिपोर्ट उत्तराखंड हाईकोर्ट के 3 अप्रैल 2026 के फैसले, सुप्रीम कोर्ट के हालिया रुख, POCSO/IPC/JJ एक्ट के प्रावधानों, अन्य हाईकोर्ट फैसलों, कानूनी समस्याओं और सुधार सुझावों पर आधारित है। रिपोर्ट कानूनी विश्लेषण, सामाजिक प्रभाव और समाधान पर केंद्रित है।)

