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पहाड़ों में महिलाओं का रौद्र रूप: शराब और नशे के खिलाफ गांव-गांव में उठाया बीड़ा, उत्तराखंड की मातृशक्ति ने मोर्चा संभाला – लोग, जगह और पहाड़ों के लिए खड़ी महिलाएं आज भी आशा की किरण

Dehradun, Uttarakhand- B P Singh-उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में इन दिनों एक नई जंग छिड़ी हुई है। नशे की लत ने परिवारों को बर्बाद कर दिया है, युवाओं का भविष्य अंधकारमय बना दिया है, किसानी छूट गई है, घरेलू हिंसा बढ़ गई है और सरकारी राजस्व के नाम पर शराब की दुकानें गांव-गांव में खुल रही हैं। लेकिन इस अंधेरे में उम्मीद की एक किरण जल रही है – पहाड़ की महिलाएं। महिला मंगल दलों के झंडे तले, गांव की चौपालों में, सड़कों पर और भूख हड़ताल तक पहुंचकर वे शराब और नशे के खिलाफ लड़ाई का बीड़ा उठा चुकी हैं। यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति, परिवार और आने वाली पीढ़ी को बचाने की लड़ाई है। चिपको आंदोलन की तरह आज फिर महिलाएं आगे आई हैं – न सिर्फ विरोध करने, बल्कि गांवों को नशामुक्त बनाने के लिए सख्त नियम थोपने, जुर्माना लगाने और सामाजिक बहिष्कार तक पहुंचने के लिए।

यह आंदोलन पूरे उत्तराखंड में फैला हुआ है। गढ़वाल से कुमाऊं तक, हर जिले में महिलाओं ने सड़क पर उतरकर हुंकार भरी है। सरकारी राजस्व के लालच में खुल रही शराब की दुकानों के खिलाफ वे “शराब नहीं, पानी दो”, “नशा मुक्त गांव”, “युवा बचाओ” जैसे नारे लगा रही हैं। जहां एक तरफ राज्य सरकार नई दुकानें खोल रही है, वहीं महिलाएं पंचायतों के साथ मिलकर पूर्ण प्रतिबंध लगा रही हैं, एक लाख रुपये तक का जुर्माना तय कर रही हैं और उल्लंघन करने वालों पर सामाजिक बहिष्कार का हथियार चला रही हैं। यह लड़ाई न सिर्फ शराब के खिलाफ है, बल्कि नशे की पूरी संस्कृति – मांस, डीजे, फास्ट फूड और दिखावे वाली शादियों – के खिलाफ भी है।

गढ़वाल क्षेत्र: चमोली और रुद्रप्रयाग में महिलाओं का सख्त मोर्चा

गढ़वाल की पहाड़ियों में आंदोलन सबसे तेज है। चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में हिमनी, बलन, सवाद, तलौर, घेस और मनमती गांवों की महिलाओं ने महिला मंगल दलों के जरिए शराब की बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। पंचायतों का पूरा समर्थन है। हिमनी गांव की महिला मंगल दल अध्यक्ष सीमा देवी (28 वर्ष) ने साफ कहा, “हम अपने गांवों को शराब मुक्त बनाना चाहती हैं। शराब की लत का परिवारों पर गहरा असर पड़ रहा है।” गांव प्रधान नीता देवी (32 वर्ष) ने जोड़ा, “आजकल युवा सहेलियों के दबाव और आसान पहुंच के कारण शराब की लत में फंस रहे हैं। पहले पुरुष खेती-किसानी करते थे, अब मजदूरी के 500 रुपये रोज कमाकर उसी दिन शराब में उड़ा देते हैं। यह चक्रव्यूह तोड़ना जरूरी है।”

जुर्माना सख्त है – शराब बेचने पर एक लाख रुपये, सार्वजनिक आयोजनों में परोसने पर 50 हजार रुपये, नशे में शोर मचाने या गाली देने पर 25 हजार रुपये। सूचना देने वाले को 10 हजार रुपये इनाम। बार-बार उल्लंघन करने वालों पर सामाजिक बहिष्कार। केटी गांव (आदिबद्री तहसील) में भी महिला मंगल दल, युवक मंगल दल और प्रधान रेखा देवी के नेतृत्व में पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया। रुद्रप्रयाग जिले के जखनी गांव में महिला मंगल दल और नवयुवक मंगल दल ने प्रधान सरोज देवी की अध्यक्षता में इसी तरह का फैसला लिया। जितपाल सिंह नेगी और योगांबर रावत जैसे ग्रामीणों ने कहा, “यह कदम जखनी को आदर्श गांव बनाने के लिए उठाया गया है।”

डंगवाल गांव (रुद्रप्रयाग) की महिलाएं तो सड़क पर उतरकर शराब और मांस दोनों के खिलाफ उग्र प्रदर्शन कर चुकी हैं। उन्होंने चेतावनी दी – अगर गांव में यह व्यापार नहीं बंद हुआ तो और बड़ा आंदोलन होगा। देवप्रयाग में एक विधवा महिला चार दिनों से भूख हड़ताल पर हैं। उनका कहना है, “जिसने यह शराब की दुकान खोली, उसने हमारे घरों को बर्बादी की राह पर धकेल दिया। हमारी जमीन बिक जाएगी, बच्चों का भविष्य अंधेरा हो जाएगा।”

कुमाऊं क्षेत्र: पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल और बागेश्वर में महिलाओं की हुंकार

कुमाऊं में भी यही कहानी है। पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग (उडियारी) में महिलाओं ने शराब की दुकान खुलने के खिलाफ तहसीलदार और आबकारी विभाग के अधिकारियों को घेर लिया। नारा था – “शराब नहीं, पानी दो”। गांव में नल का पानी नहीं है, लोग दो किलोमीटर दूर नाले से पानी लाते हैं, लेकिन सरकार ने शराब की दुकान खोल दी। पंचायत प्रधान हेमा महरा और क्षेत्र पंचायत सदस्य अल्का आर्या समेत दर्जनों महिलाएं प्रदर्शन में शामिल हुईं। उन्होंने कहा, “सरकार बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है।” बेरीनाग से 10 किलोमीटर दूर शहर के पास भी यही विरोध।

अल्मोड़ा में महिलाओं के दबाव में दौलाघाट, टिपोला, खेड़ा और पटली जैसे इलाकों में नई शराब दुकानों को बंद करवाया गया। नैनीताल के रातीघाट में महिलाएं सड़क पर उतरीं, नारेबाजी की और नई दुकान बंद करने की मांग की। बागेश्वर के सोराग गांव की महिलाओं ने नशामुक्त गांव बनाने के लिए 15 किलोमीटर पैदल रैली निकाली। उन्होंने पूरे इलाके में जागरूकता फैलाई और शराब के खिलाफ खुली हुंकार भरी।

जौनसार-बावर (चकराता) में सांस्कृतिक क्रांति

देहरादून जिले के जौनसार-बावर के आदिवासी क्षेत्र में 25 गांवों (खट सैली इलाके) ने नवंबर 2025 में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। दोहा गांव में राजेंद्र सिंह तोमर की अध्यक्षता में हुई बैठक में फैसला लिया गया – शादियों और सामाजिक आयोजनों में शराब, फास्ट फूड (चौमीन, मोमोज, टिक्की, पिज्जा, पास्ता), डीजे और महंगे उपहार पूर्णतः प्रतिबंधित। उल्लंघन पर एक लाख रुपये जुर्माना। उद्देश्य – सांस्कृतिक विरासत बचाना, दिखावे को रोकना और सामाजिक दबाव कम करना। गांव के बुजुर्गों ने कहा, “पारंपरिक गढ़वाली व्यंजन और लोक संगीत को बढ़ावा देंगे, महंगे रिवाजों को नहीं।”

नशे का आतंक: क्यों उठी महिलाएं?

यह आंदोलन बिना कारण नहीं है। पहाड़ों में शराब और नशे ने परिवारों को चूर-चूर कर दिया है। पुरुष रोज की मजदूरी शराब में उड़ा देते हैं, खेती छूट गई, बच्चे स्कूल नहीं जाते, घरेलू हिंसा बढ़ी। युवा सहेलियों के दबाव में फंस रहे हैं। सरकार राजस्व के लिए दुकानें खोल रही है, जबकि गांवों में पानी, बिजली, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं। महिलाएं कहती हैं – “हम चुप नहीं रहेंगी। हमारी मातृशक्ति अब चुपचाप सहने वाली नहीं।”

आशा क्यों जिंदा है? उत्तराखंड की महिलाएं अभी भी लोगों, जगह और पहाड़ों के लिए खड़ी हैं

यह आंदोलन उत्तराखंड की महिलाओं की जिजीविषा को दर्शाता है। चिपको आंदोलन में पेड़ों को गले लगाने वाली महिलाएं आज शराब की बोतलों के खिलाफ खड़ी हैं। वे न सिर्फ अपने परिवारों (लोगों) के लिए लड़ रही हैं, बल्कि पहाड़ी गांवों की सांस्कृतिक और सामाजिक जगह को बचाने के लिए। देवभूमि की पवित्रता, परिवार की एकता और आने वाली पीढ़ी के भविष्य को संरक्षित करने के लिए। सरकारी उदासीनता के बावजूद, पंचायतों के साथ मिलकर वे स्वशासन का मॉडल बना रही हैं। यह दिखाता है कि पहाड़ की महिलाएं अभी भी जीवित हैं – साहसी, एकजुट और जिम्मेदार। वे पलायन रोक रही हैं, युवाओं को बच रही हैं और पहाड़ों को नशे की जकड़ से मुक्त कर रही हैं। यह आशा की किरण है कि जब पुरुष और व्यवस्था चुप हैं, तब मातृशक्ति आगे आकर समाज को संभाल लेती है।

पुरुषों और पीढ़ियों को महिलाओं के इस आंदोलन से क्या सीखना चाहिए?

इस लड़ाई से पुरुषों और नई पीढ़ी को कई सबक मिलने चाहिए। पहला – आत्मसंयम। शराब को ‘मर्दानगी’ का प्रतीक मानना छोड़ें। परिवार की जिम्मेदारी पहले। दूसरा – महिलाओं का साथ दें, उनका नेतृत्व स्वीकार करें। पितृसत्ता तोड़ें, उनकी आवाज को मजबूत बनाएं। तीसरा – समुदाय की जिम्मेदारी। व्यक्तिगत सुख से ऊपर गांव की भलाई। चौथा – सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ें। दिखावे और फास्ट फूड की बजाय पारंपरिक मूल्यों को अपनाएं। पांचवां – युवाओं को सिखाएं कि सच्ची ताकत नशे में नहीं, मेहनत और अनुशासन में है।

महिलाओं ने साबित किया कि जब इच्छाशक्ति हो तो बदलाव संभव है। अब पुरुषों को उनके साथ खड़ा होना चाहिए, न कि विरोध करना। आने वाली पीढ़ियां इस आंदोलन को इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी – कैसे पहाड़ की महिलाओं ने न सिर्फ शराब का बहिष्कार किया, बल्कि पूरे समाज को नशामुक्त और सशक्त बनाने का रास्ता दिखाया।

उत्तराखंड के पहाड़ आज भी महिलाओं के कंधों पर टिके हैं। यह लड़ाई जारी रहेगी। जब तक हर गांव नशामुक्त नहीं हो जाता, तब तक मातृशक्ति का रौद्र रूप दिखता रहेगा। यह सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि एक नई क्रांति है – परिवार बचाओ, गांव बचाओ, पहाड़ बचाओ।

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