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उत्तराखंड में शिक्षा: वर्तमान स्थिति और चुनौतियां

भारत में शिक्षा और साक्षरता (Literacy) समाज, राजनीति और आर्थिक प्रगति की मजबूत नींव हैं। शिक्षा न केवल व्यक्तिगत विकास करती है, बल्कि समाज को मजबूत, राजनीति को जागरूक और अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाती है। हाल के वर्षों में, केंद्र सरकार की ULLAS (Understanding Lifelong Learning for All in Society) योजना (2022 से) ने वयस्क शिक्षा को बढ़ावा दिया है, जिसमें foundational literacy, numeracy, digital और financial literacy शामिल है। 2025 में राष्ट्रीय साक्षरता दर PLFS 2023-24 के अनुसार 80.9% पहुंच गई है (2011 में 74% से सुधार), जबकि 2025 अनुमानित औसत 77.7-80.9% के बीच है। कई राज्य पूर्ण साक्षर (fully literate, 95%+ साक्षरता) घोषित हो चुके हैं।

पूर्ण साक्षर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश (2025 तक)

ये उपलब्धियां ULLAS के तहत FLNAT परीक्षा, स्वयंसेवकों और समुदाय भागीदारी से हासिल हुई हैं।

हिमाचल प्रदेश का सफल मॉडल

स्वतंत्रता के समय (1947-51) मात्र 7-8% साक्षरता से 2025 में 99.3% तक पहुंचना क्रांतिकारी है। राज्य ने शिक्षा पर 17-18% बजट खर्च किया, स्कूलों का विस्तार, ड्रॉपआउट शून्य के करीब लाया, और ULLAS के तहत 43,885+ वयस्कों को FLNAT पास कराया। महिला साक्षरता पर फोकस, पहाड़ी इलाकों में पहुंच और छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार प्रमुख हैं। 2026 तक शेष अशिक्षितों को पूरा करने का लक्ष्य है।

केरल का क्लासिक मॉडल

केरल 1991 में ही पूर्ण साक्षर घोषित हो चुका था (टोटल लिटरेसी कैंपेन से)। सामाजिक सुधार, मिशनरी स्कूल, भूमि सुधार और समुदाय भागीदारी (NSS, SNDP, Kudumbashree) ने आधार तैयार किया। KSLMA ने जीवनभर शिक्षा पर जोर दिया। Digi Kerala ने डिजिटल युग में नया अध्याय जोड़ा, जहां ग्रामीण और बुजुर्गों को भी डिजिटल स्किल्स सिखाई गईं।

उत्तराखंड की स्थिति और तुलना

उत्तराखंड की साक्षरता दर 2011 जनगणना के अनुसार 78.82% (पुरुष 87.4%, महिला 70.01%) है – राष्ट्रीय औसत से बेहतर, लेकिन पूर्ण साक्षर राज्यों से पीछे। ग्रामीण में 76.31%, शहरी में 84.45%। ULLAS यहां लागू है, लेकिन हालिया पूर्ण घोषणा नहीं हुई। हिमाचल (99.3%) और केरल (95%+ + डिजिटल 100%) से तुलना में चुनौतियां: पहाड़ी भूगोल, पहुंच की कमी और महिला साक्षरता में अंतर।

समाज में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका

शिक्षा समाज को बदलती है – गरीबी, असमानता, जातिवाद, लिंग भेदभाव और अंधविश्वास कम करती है। शिक्षित व्यक्ति बेहतर निर्णय लेते हैं, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और पर्यावरण में जागरूक होते हैं। UNESCO के अनुसार, शिक्षा SDGs की कुंजी है – आर्थिक विकास, नवाचार, संस्थागत मजबूती और सामाजिक एकता बढ़ाती है। भारत में, यह सामाजिक गतिशीलता प्रदान करती है, विशेषकर महिलाओं और वंचित वर्गों (SC/ST/OBC) के लिए। उच्च साक्षरता से गरीबी का चक्र टूटता है और समाज समावेशी बनता है।

राजनीतिक प्रगति और जागरूकता में शिक्षा की भूमिका

शिक्षा राजनीतिक जागरूकता बढ़ाती है – नागरिक अपने अधिकार जानते हैं, चुनाव में भाग लेते हैं और लोकतंत्र मजबूत होता है। उच्च साक्षरता से राजनीतिक भागीदारी, विश्वास और स्वयंसेवा बढ़ती है। भारत में, शिक्षा ने राष्ट्रीय एकीकरण, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय को बढ़ावा दिया। NEP 2020 महत्वपूर्ण सोच और नागरिक मूल्यों को प्रोत्साहित करती है। शिक्षित समाज में भ्रष्टाचार कम होता है, नीतियां प्रभावी बनती हैं। बिना शिक्षा के राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है, जबकि शिक्षा शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण समाज बनाती है।

आर्थिक प्रगति और विकास में शिक्षा की भूमिका

शिक्षा आर्थिक विकास की इंजन है – मानव पूंजी विकसित करती है, कौशल प्रदान करती है और रोजगार बढ़ाती है। विश्व बैंक और IMF के अनुसार, शिक्षा गरीबी कम करती है, आय असमानता घटाती है और लंबे समय तक विकास गति देती है। भारत में, शिक्षा ने IT, विज्ञान और अनुसंधान में प्रगति दी। उच्च साक्षरता वाले राज्यों में आय अधिक होती है, और डिजिटल साक्षरता से उद्यमिता, ऑनलाइन सेवाएं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा संभव होती है।

उत्तराखंड को आगे क्या करना चाहिए?

शिक्षा समाज को मजबूत, राजनीति को जागरूक और अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाती है। केरल, हिमाचल और अन्य राज्यों की सफलता साबित करती है कि मजबूत इच्छाशक्ति और प्रयासों से पहाड़ी राज्य भी शीर्ष पर पहुंच सकते हैं। उत्तराखंड भी इनसे प्रेरणा लेकर तेजी से आगे बढ़ सकता है – शिक्षा से ही आत्मनिर्भर और सस्टेनेबल भारत संभव है!

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