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देहरादून: कनवाली में तेज रफ्तार डंपर से कुचले गए पैदल यात्री की मौत; स्थानीय लोगों ने सड़क जाम कर प्रदर्शन किया, लापरवाही पर प्रशासन से कार्रवाई की मांग*

**देहरादून, 6 मई 2026:** सड़क दुर्घटनाओं में लगातार बढ़ रही मौतों का एक और दर्दनाक मामला सामने आया है। कनवाली रोड पर बुधवार सुबह एक 40 वर्षीय पैदल यात्री सतेन्द्र साहनी की तेज रफ्तार डंपर ट्रक की चपेट में आकर मौत हो गई। यह दुर्घटना सिद्धार्थ प्रोजेक्ट के पास ढलान वाली जगह पर हुई, जहां बल्लूपुर चौराहे से आ रहे बजरी लदे डंपर ने तेज गति से आकर सड़क किनारे खड़े व्यक्ति को कुचल दिया।ड्राइवर मौके से फरार हो गया और वाहन छोड़कर भाग निकला।

स्थानीय लोगों ने तुरंत विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। उन्होंने शव को सड़क पर रख दिया, कनवाली रोड को जाम कर दिया और जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने डंपर के शीशे तोड़े, बैनर फाड़े और लकड़ी-टायर जलाकर आगजनी की। उन्होंने पुलिस और प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया। प्रदर्शनकारियों ने शुरुआत में शव नहीं सौंपा और ड्राइवर की तुरंत गिरफ्तारी, परिवार को मुआवजा तथा अधिकारियों की मौजूदगी की मांग की। पुलिस ने तनावपूर्ण माहौल का सामना किया, लेकिन अब CCTV फुटेज के आधार पर ड्राइवर की तलाश कर रही है।

### रोजाना हो रही मौतें:

स्पीड हत्यारी, प्रशासन विफलयह घटना कोई अलग मामला नहीं है। वर्ष 2025 में उत्तराखंड में **1,846 सड़क दुर्घटनाएं** हुईं, जिनमें **1,242 लोगों की मौत** हुई और 2,000 से अधिक लोग घायल हुए — जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी वृद्धि है। देहरादून जिला इन दुर्घटनाओं में लगातार आगे है। हाल के महीनों में पैदल यात्रियों और युवाओं की डंपर से कई मौतें हो चुकी हैं।

**स्पीड सबसे बड़ा कारण**

इन ज्यादातर निवारणीय मौतों का। अनियंत्रित डंपर और भारी वाहन शहर की सड़कों पर खतरनाक गति से दौड़ते रहते हैं, खासकर सुबह के समय। ओवर-स्पीडिंग से प्रतिक्रिया समय कम हो जाता है, ब्रेक लगाने की दूरी बढ़ जाती है और छोटी गलती भी घातक दुर्घटना में बदल जाती है। पैदल यात्री, साइकिल सवार और दोपहिया वाहन चालक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।बार-बार होने वाली घटनाओं और जन आक्रोश के बावजूद प्रशासन सख्त कदम उठाने में पूरी तरह विफल रहा है। ओवरलोडेड या तेज रफ्तार वाणिज्यिक वाहनों की जांच नाकाफी है, सड़क डिजाइन पर अमल नहीं हो रहा है और कनवाली जैसे हाई-रिस्क इलाकों में पुलिसिंग दिखाई नहीं देती। न्याय में देरी और सिस्टम में बदलाव न होने के कारण प्रदर्शन रोजमर्रा की बात बन गए हैं।

### तत्काल मांग: सभी शहरों में 50 किमी/घंटा स्पीड लिमिट लागू करेंविश्व भर के सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी इलाकों में कम गति से जानें बचाई जा सकती हैं। मिश्रित यातायात, पैदल यात्री और बार-बार चौराहों वाले भारतीय शहरों में **शहर के अंदर 50 किमी प्रति घंटा** की अनिवार्य स्पीड लिमिट जरूरी है।

कई देशों और कुछ भारतीय राज्यों ने 50 किमी/घंटा की शहरी सीमा सफलतापूर्वक लागू की है (स्कूलों और बाजारों के पास और भी कम लिमिट)

।- शहर की सड़कों पर तेज गति भारी वाहनों को मौत का हथियार बना देती है

।- स्पीड कैमरे, भारी जुर्माना और वाहन जब्ती से उल्लंघनकर्ताओं को रोका जा सकता है

।- सरकार को उत्तराखंड के सभी शहरी क्षेत्रों में 50 किमी/घंटा की स्पष्ट अधिसूचना जारी करनी चाहिए और खासकर भारी वाहनों पर सख्ती से लागू करनी चाहिए।तुरंत कार्रवाई न होने पर आम नागरिक रोज अपनी जान जोखिम में डालते रहेंगे। पैदल यात्री सुरक्षित नहीं हैं, परिवार लगातार अपनों को खो रहे हैं और सड़कें कत्लगाह बनी हुई हैं।

देहरादून की यह घटना प्रशासन के लिए जगाने वाली घंटी होनी चाहिए। प्रशासन को सिर्फ संवेदना और प्रदर्शन नियंत्रण से आगे बढ़कर ठोस सुधार करने होंगे — स्पीड लिमिट लागू करना, आबादी वाले इलाकों में भारी वाहनों की आवाजाही नियंत्रित करना और सड़क सुरक्षा ऑडिट को प्राथमिकता देना। जिंदगियां दांव पर हैं।

**स्पीड मारती है — सख्त लिमिट बचाती है।**

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