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गौलापार में हाईकोर्ट स्थानांतरण संबंधी निर्णय पर अधिवक्ताओं की प्रतिक्रिया, डॉ. महेंद्र सिंह पाल बोले— “यह उत्तराखंड की न्यायिक संतुलन की भावना के अनुरूप कदम”

हल्द्वानी/देहरादून, 15 जुलाई 2026।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के गौलापार (हल्द्वानी) में स्थानांतरण से जुड़े घटनाक्रम पर प्रदेश के विधिक समुदाय में चर्चा तेज हो गई है। इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उत्तराखंड बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष डॉ. महेंद्र सिंह पाल ने कहा कि उनके अनुसार यह निर्णय उत्तराखंड के न्यायिक संतुलन और क्षेत्रीय समानता की भावना के अनुरूप है।

डॉ. पाल ने कहा कि उत्तराखंड एक पर्वतीय राज्य है, जिसकी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियाँ अन्य राज्यों से भिन्न हैं। उनके अनुसार राज्य के न्यायिक ढाँचे से जुड़े किसी भी बड़े निर्णय में केवल एक शहर या क्षेत्र नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि उच्च न्यायालय को देहरादून स्थानांतरित करने का विकल्प अपनाया जाता, तो इससे राज्य के अन्य क्षेत्रों, विशेषकर कुमाऊँ मंडल, के अधिवक्ताओं, वादकारियों और आम नागरिकों के हित प्रभावित हो सकते थे। उनके अनुसार न्याय तक समान पहुँच सुनिश्चित करना उत्तराखंड की मूल भावना का हिस्सा है।

डॉ. महेंद्र सिंह पाल ने इस अवसर पर अधिवक्ताओं और बार एसोसिएशनों की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि न्यायालय से जुड़े विषयों पर वर्षों से अनेक अधिवक्ताओं और विधिक संगठनों ने अपने सुझाव और पक्ष रखा। उनके अनुसार यह घटनाक्रम अधिवक्ताओं की प्रतिबद्धता, लोकतांत्रिक संवाद और न्यायिक संस्थाओं के प्रति विश्वास का परिणाम है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के गठन का उद्देश्य केवल नया राज्य बनाना नहीं था, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों को प्रशासनिक और न्यायिक सुविधाओं तक बेहतर पहुँच उपलब्ध कराना भी था। इसलिए न्यायिक संस्थानों से जुड़े निर्णयों में क्षेत्रीय संतुलन, भौगोलिक परिस्थितियों और आम नागरिकों की सुविधा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

डॉ. पाल ने यह भी कहा कि राज्य के विकास के साथ-साथ न्यायिक अधोसंरचना का विस्तार आवश्यक है। आधुनिक न्यायालय परिसर, डिजिटल सुविधाएँ, पर्याप्त अधिवक्ता चैंबर, पार्किंग, पुस्तकालय और वादकारियों के लिए बेहतर सुविधाएँ विकसित की जानी चाहिए ताकि न्यायिक व्यवस्था अधिक प्रभावी और सुलभ बन सके।

आंदोलन और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े अधिवक्ताओं का कहना है कि उत्तराखंड बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष डॉ. महेंद्र सिंह पाल ने उच्च न्यायालय को अन्य स्थान पर स्थानांतरित किए जाने के प्रस्ताव का विधिक स्तर पर लगातार विरोध किया था। उनके समर्थकों के अनुसार उन्होंने इस विषय पर विभिन्न मंचों पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराईं और अधिवक्ताओं के हितों तथा न्याय तक समान पहुँच के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।

डॉ. पाल के समर्थन में कई अधिवक्ताओं ने कहा कि उन्होंने लंबे समय तक इस विषय पर निरंतर प्रयास किए और उत्तराखंड के न्यायिक ढाँचे से जुड़े मुद्दों को मजबूती से रखा। उनके अनुसार उच्चतम न्यायालय के हालिया घटनाक्रम को वे न्यायिक प्रक्रिया की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं तथा इसे राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के बीच न्यायिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में सकारात्मक कदम के रूप में देखते हैं।

कई अधिवक्ताओं ने डॉ. महेंद्र सिंह पाल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके समर्पण, प्रतिबद्धता और निरंतर प्रयासों ने इस मुद्दे को जीवित रखा। उनके अनुसार यह केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उत्तराखंड की विभिन्न बार एसोसिएशनों, वरिष्ठ एवं युवा अधिवक्ताओं तथा विधिक समुदाय के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।हालाँकि, इस विषय पर अलग-अलग पक्षों के अलग-अलग मत रहे हैं।

उच्च न्यायालय के स्थान, न्यायिक अवसंरचना और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों पर अंतिम स्थिति सक्षम न्यायालयों के आदेशों और वैधानिक निर्णयों से ही निर्धारित होती है। इसलिए किसी एक व्यक्ति को संपूर्ण परिणाम का श्रेय देना उचित नहीं होगा, जबकि विभिन्न अधिवक्ताओं, बार संगठनों और न्यायिक प्रक्रिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में राज्य सरकार, न्यायपालिका और अधिवक्ता संगठन आपसी समन्वय से ऐसा समाधान विकसित करेंगे जो न्यायपालिका की आवश्यकताओं के साथ-साथ उत्तराखंड के सभी क्षेत्रों के नागरिकों के हितों की भी रक्षा करे।

हालाँकि, इस विषय पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय रही है। पूर्व में उच्च न्यायालय के स्थानांतरण को लेकर न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर कई प्रस्ताव, आपत्तियाँ और अदालती कार्यवाहियाँ भी हुई हैं, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप भी शामिल रहा है। इसलिए इस मुद्दे का अंतिम समाधान विधिक प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारियों के निर्णयों के अनुरूप ही होगा।

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