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उत्तराखंड हाईकोर्ट में अवमानना याचिका पर सख्त रुख: कार्मिक सचिव को तलब, नियमितीकरण आदेश की अवहेलना पर नाराजगी

नैनीताल, 7 अप्रैल 2026: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कर्मचारियों के नियमितीकरण संबंधी अपने पूर्व आदेशों की अवहेलना पर सरकार के रवैये पर कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायालय ने कार्मिक विभाग के सचिव को अवमानना याचिका की सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

मामला कुंदन सिंह जजमेंट से जुड़ा है, जिसमें कर्मचारियों के नियमितीकरण के तीन प्रमुख बिंदुओं पर स्पष्ट आदेश दिए गए थे। याचिकाकर्ता संगठन की ओर से दलील दी गई कि इन बिंदुओं में से एक का भी अनुपालन नहीं किया गया। इसके बजाय विभाग ने अनुबंध आधारित नियुक्तियां जारी रखीं, जो न्यायालय के आदेश की भावना के पूरी तरह विपरीत है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने अनुबंध पत्र का पैरा-1 पढ़ा और टिप्पणी की, “जहां आदेश नियमितीकरण का है, वहां अनुबंध आधारित नियुक्ति करना आदेश की भावना के विपरीत है। अनुबंध पत्र में नियुक्ति को पूर्णतः अस्थायी बताना सीधे तौर पर न्यायालय के आदेश का उल्लंघन है।” न्यायालय ने सरकार की ओर से उपस्थित अपर महाधिवक्ता से सवाल किया कि नियमितीकरण किन परिस्थितियों में किया जाता है और अनुबंध व्यवस्था को गलत ठहराते हुए स्पष्ट जवाब मांगा।

संगठन के वरिष्ठ अधिवक्ता जीतेन्द्र मोहन शर्मा ने जोर देकर कहा कि सरकार की अपील पहले ही खारिज हो चुकी है, जिससे सर्वोच्च न्यायालय का आदेश प्रभावी हो गया है। इसके बावजूद तय समयसीमा के अंदर आदेश का पालन न होना गंभीर अवमानना है। अधिवक्ता एम.सी. पंत ने भी संगठन की ओर से याचिका के पक्ष में मजबूत दलीलें दीं।

न्यायालय ने सरकार की लापरवाही पर गंभीर टिप्पणी की और नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि अगली सुनवाई में विभाग को बताना होगा कि अब तक कितने कर्मचारियों का नियमितीकरण किया गया है।

मुख्य आदेश:
कार्मिक विभाग के सचिव को 20 अप्रैल 2026 को प्रातः 10:30 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, नियमितीकरण की प्रगति पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।

यह मामला उत्तराखंड सरकार के विभिन्न विभागों में लंबे समय से काम कर रहे संविदा/अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद विभागीय स्तर पर जानबूझकर देरी की जा रही है, जिससे कर्मचारियों के अधिकारों का हनन हो रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विभाग आदेशों का अनुपालन नहीं करता तो न्यायालय आगे सख्त कदम उठा सकता है, जिसमें दंडात्मक कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। यह घटनाक्रम राज्य सरकार के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि न्यायालय के आदेशों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

पृष्ठभूमि:
कुंदन सिंह मामले में दिए गए फैसले के बाद कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू होनी थी, लेकिन याचिकाकर्ता संगठन का आरोप है कि विभाग ने इसे टालते हुए अनुबंध प्रणाली को जारी रखा, जो अदालती आदेश की अवहेलना है। अवमानना याचिका संख्या 402/2024 के तहत यह सुनवाई हुई।

यह विकास उत्तराखंड में सरकारी कर्मचारियों के सेवा नियमों और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर नई बहस छेड़ सकता है। कर्मचारी संगठन अब न्यायालय के सख्त रुख से उम्मीद जता रहे हैं कि नियमितीकरण प्रक्रिया तेजी से पूरी होगी और कर्मचारियों को उनका हक मिलेगा।

अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होगी, जब सचिव की उपस्थिति में मामले की आगे की कार्यवाही होगी। राज्य सरकार पर अब दबाव बढ़ गया है कि वह न्यायालय के आदेशों का शीघ्र और पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करे।

(समाचार विभिन्न न्यायिक सूत्रों और अदालती कार्यवाही पर आधारित)

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