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हिमालय में ऊंचाई-निर्भर तापन (Elevation-Dependent Warming): एक बढ़ती चिंता

हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख प्रभाव ऊंचाई-निर्भर तापन (Elevation-Dependent Warming – EDW) है, जिसमें ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान वृद्धि की दर तेज हो जाती है। कई अध्ययनों से पता चलता है कि हिमालय और तिब्बती पठार जैसे उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लोबल एवरेज से ज्यादा तेजी से गर्मी बढ़ रही है, खासकर ऊंचे इलाकों में। 1950 से अब तक उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापन ग्लोबल औसत से करीब 50% तेज रहा है। हाल के अध्ययनों (2023-2025) में पुष्टि हुई है कि यह प्रवृत्ति जारी है, और उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में और तेज हो सकती है।

EDW क्या है और हिमालय में इसका पैटर्न

EDW का मतलब है कि तापमान वृद्धि की दर ऊंचाई के साथ व्यवस्थित रूप से बदलती है – आमतौर पर ऊंचे इलाकों में ज्यादा तेज। हिमालय में:

मुख्य कारण

EDW के पीछे कई भौतिक प्रक्रियाएं जिम्मेदार हैं:

भारतीय संस्थानों की रिपोर्ट्स और अध्ययन

भारतीय संस्थानों ने EDW पर महत्वपूर्ण शोध किया है, जो हिमालय की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं:

ये संस्थान सैटेलाइट डेटा, फील्ड ऑब्जर्वेशन और मॉडलिंग से EDW की पुष्टि करते हैं, जो स्नो-आइस फीडबैक से驱动ित है।

वर्तमान स्थिति: पहाड़ों में कम बर्फबारी, कोई वर्षा नहीं और बदलते पैटर्न

2025 के दिसंबर में उत्तराखंड और हिमालय के कई हिस्सों में अब तक सामान्य बर्फबारी नहीं हुई है। केदारनाथ से औली तक के चोटियां बर्फ रहित हैं, जिसे ‘स्नो फेमिन’ कहा जा रहा है। कमजोर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस और जलवायु परिवर्तन के कारण यह सूखा सर्दी का मौसम है। हालांकि, 31 दिसंबर से 2 जनवरी तक ऊपरी इलाकों में बर्फबारी की संभावना है, लेकिन दिसंबर तक की कमी चिंताजनक है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 2025 तीसरा लगातार कम स्नो पर्सिस्टेंस वाला साल रहा, जो 23 साल का रिकॉर्ड लो है।

यह कितना खतरनाक है: लोगों के लिए प्रभाव

अब तक कोई बर्फबारी न होना बेहद खतरनाक है:

वृक्षारोपण और पेड़ों तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा क्यों अनिवार्य है

जलवायु परिवर्तन और EDW के बढ़ते प्रभावों के बीच वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों (पेड़, जंगल, जल स्रोत) की बचत अब जीवन-मरण का सवाल बन गई है। मुख्य कारण:

बिना तत्काल बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और डिफॉरेस्टेशन रोक के EDW के प्रभाव और घातक हो जाएंगे – अधिक बाढ़, सूखा, प्रदूषण और खाद्य संकट।

क्या किया जा सकता है और गंभीरता क्यों जरूरी

यह EDW और जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव है, इसलिए गंभीरता से लेना जरूरी:

प्रभाव और परिणाम

आगे की संभावनाएं

मॉडल प्रोजेक्शन (CMIP5 और हाल के) बताते हैं कि 21वीं सदी में EDW और तेज होगा, खासकर उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियर कूलिंग प्रभाव से लोकल ठंडक भी संभव है।

यह घटना हिमालय को जलवायु परिवर्तन का ‘हॉटस्पॉट’ बनाती है। उत्सर्जन कम करना, मॉनिटरिंग बढ़ाना (जैसे WIHG, WII, GBPIHED द्वारा) और अनुकूलन रणनीतियां जरूरी हैं ताकि इस संवेदनशील क्षेत्र की रक्षा हो सके। भारतीय संस्थानों के शोध से नीति निर्माण में मदद मिल रही है।

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