पहाड़ के युवाओं को स्थानीय रोजगार से जोड़ने के लिए स्कूल स्तर से कौशल प्रशिक्षण शुरू करने की मांग; कृषि, पर्यटन, तकनीक, उद्योग और स्वरोजगार को शिक्षा से जोड़ने की जरूरत, सरकार तत्काल तैयार करे समयबद्ध कार्ययोजना
हिमांजली एक्सप्रेस न्यूज|भानु प्रताप सिंह/-देहरादून नैनीताल/विशेष रिपोर्ट
उत्तराखंड में शिक्षा के विस्तार के बावजूद युवाओं के सामने रोजगार और पलायन की चुनौती बनी हुई है। प्रदेश के हजारों युवा उच्च शिक्षा और विभिन्न डिग्रियां हासिल करने के बाद भी रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों और महानगरों का रुख करते हैं। वहीं दूसरी ओर प्रदेश में पर्यटन, कृषि, बागवानी, होटल उद्योग, निर्माण, तकनीकी सेवाओं, खाद्य प्रसंस्करण और डिजिटल व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में रोजगार एवं स्वरोजगार की अनेक संभावनाएं मौजूद हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था युवाओं को केवल परीक्षा पास करने और डिग्री प्राप्त करने के लिए तैयार कर रही है, या उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने योग्य भी बना रही है?
अब समय आ गया है कि उत्तराखंड में किताबी शिक्षा के साथ व्यावहारिक और रोजगारपरक शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए। इसके लिए किसी लंबी प्रतीक्षा के बजाय सरकार को तत्काल चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार कर स्कूलों, कॉलेजों, ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों में कौशल आधारित प्रशिक्षण का विस्तार करना चाहिए।
दुनिया के सफल शिक्षा मॉडल से सीखने की जरूरत
जर्मनी में विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ उद्योगों में काम सीखने का अवसर मिलता है। फिनलैंड में प्रयोगात्मक शिक्षा, स्वतंत्र सोच और समस्या समाधान पर जोर है। जापान में अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी को शिक्षा का हिस्सा बनाया गया है, जबकि चीन और सिंगापुर में विज्ञान, गणित और तकनीकी शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता है।
उत्तराखंड भी इन व्यवस्थाओं से सीख लेकर अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा मॉडल विकसित कर सकता है।
उत्तराखंड में किन क्षेत्रों का प्रशिक्षण जरूरी?
प्रदेश के प्रत्येक जिले में स्थानीय रोजगार की संभावनाओं के अनुसार प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए।
1. तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण
- इलेक्ट्रिशियन और सोलर पैनल तकनीशियन।
- प्लंबिंग और पाइपलाइन कार्य।
- कारपेंटरी और फर्नीचर निर्माण।
- ऑटोमोबाइल और मोटर मैकेनिक।
- मोबाइल रिपेयरिंग और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत।
- कंप्यूटर हार्डवेयर और नेटवर्किंग।
2. पर्यटन और होटल उद्योग
- प्रशिक्षित पर्वतीय पर्यटन गाइड।
- होटल और हॉस्पिटैलिटी प्रबंधन।
- होमस्टे संचालन और प्रबंधन।
- ट्रेकिंग, पर्वतीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन।
- स्थानीय संस्कृति, खानपान और भाषा का प्रशिक्षण।
- बेसिक अंग्रेजी और अतिथि सत्कार का प्रशिक्षण।
3. कृषि और स्वरोजगार
- आधुनिक कृषि और बागवानी।
- मशरूम उत्पादन और मधुमक्खी पालन।
- फल एवं खाद्य प्रसंस्करण।
- डेयरी और पशुपालन।
- जैविक उत्पादों की पैकेजिंग और मार्केटिंग।
- स्थानीय उत्पादों को ऑनलाइन बाजार से जोड़ना।
4. डिजिटल और आधुनिक तकनीकी शिक्षा
- कंप्यूटर और AI का व्यावहारिक ज्ञान।
- डिजिटल मार्केटिंग।
- ग्राफिक डिजाइन और वीडियो एडिटिंग।
- वेबसाइट निर्माण और ई-कॉमर्स।
- डेटा प्रबंधन और डिजिटल सेवाएं।
इन पाठ्यक्रमों को केवल प्रमाणपत्र देने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को वास्तविक उपकरणों, मशीनों, कार्यस्थलों और बाजार की जरूरतों से परिचित कराया जाए।
स्कूल स्तर से शुरू हो व्यावहारिक शिक्षा
कौशल विकास की शुरुआत कॉलेज पहुंचने के बाद नहीं, बल्कि स्कूली शिक्षा के दौरान होनी चाहिए।
कक्षा 6 से विद्यार्थियों को विभिन्न व्यवसायों और तकनीकी क्षेत्रों का परिचय दिया जा सकता है। कक्षा 8 से उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार कौशल आधारित गतिविधियां शुरू हों तथा कक्षा 9 से स्थानीय उद्योगों, संस्थानों और प्रशिक्षित विशेषज्ञों के माध्यम से व्यावहारिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए।
कक्षा 11 और 12 में विद्यार्थियों को सामान्य शिक्षा के साथ रोजगारपरक विषयों का विकल्प मिलना चाहिए।
इस व्यवस्था में किसी विद्यार्थी पर एक ही करियर चुनने का दबाव नहीं होना चाहिए। उसे आगे चलकर उच्च शिक्षा और दूसरे व्यवसायों में जाने के अवसर भी उपलब्ध रहने चाहिए।
सरकार प्रतिष्ठित कंपनियों और उद्योगों से करे समझौते
प्रदेश में कौशल प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए सरकार को प्रतिष्ठित कंपनियों, तकनीकी संस्थानों और स्थानीय उद्योगों के साथ समझौते करने चाहिए।
टाटा जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों और अन्य अनुभवी प्रशिक्षण संस्थाओं के सहयोग से जिलेवार कौशल विकास केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं।
इन केंद्रों में आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित शिक्षक, उद्योग विशेषज्ञ और वास्तविक कार्यस्थल पर प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।
प्रशिक्षण पूरा करने वाले युवाओं को कंपनियों और स्थानीय उद्योगों में अप्रेंटिसशिप, प्लेसमेंट तथा स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए भी व्यवस्था बनाई जाए।
युवाओं को प्रशिक्षण के बाद आर्थिक सहायता भी मिले
केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं है। यदि कोई युवा इलेक्ट्रिशियन, मोबाइल रिपेयरिंग, कारपेंटरी, पर्यटन या खाद्य प्रसंस्करण का काम शुरू करना चाहता है तो उसे शुरुआती आर्थिक सहायता और बाजार तक पहुंच भी मिलनी चाहिए।
सरकार निम्नलिखित कदम उठा सकती है:
- प्रशिक्षित युवाओं को पात्रता और व्यवहार्यता के आधार पर ₹2 लाख से ₹5 लाख तक के स्वरोजगार ऋण की सुविधा।
- छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए उपकरण खरीदने में सहायता।
- स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग और बिक्री में सहयोग।
- महिला स्वयं सहायता समूहों और युवा उद्यमियों को विशेष प्रशिक्षण।
- प्रशिक्षित युवाओं को सरकारी एवं निजी संस्थानों की जरूरतों से जोड़ना।
- सफल व्यवसाय स्थापित करने वाले युवाओं के लिए मेंटरशिप और बाजार संपर्क।
प्रत्येक जिले के लिए रोजगार आधारित प्रशिक्षण केंद्र
उत्तराखंड के प्रत्येक जिले में कम से कम एक आधुनिक कौशल एवं रोजगार प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया जाना चाहिए।
इन केंद्रों का पाठ्यक्रम जिले की स्थानीय जरूरतों के अनुसार निर्धारित हो।
उदाहरण के लिए, पर्यटन की संभावनाओं वाले जिलों में होटल प्रबंधन, गाइड प्रशिक्षण और होमस्टे संचालन को प्राथमिकता मिले। कृषि एवं बागवानी वाले क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण, आधुनिक खेती और विपणन का प्रशिक्षण हो। औद्योगिक क्षेत्रों में मशीन संचालन, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और तकनीकी सेवाओं पर ध्यान दिया जाए।
सरकार के सामने तत्काल लागू करने योग्य मांगें
प्रदेश में व्यावहारिक और रोजगारपरक शिक्षा को धरातल पर उतारने के लिए निम्नलिखित समयबद्ध कार्ययोजना लागू की जानी चाहिए:
- पहले 3 महीने: प्रत्येक जिले में रोजगार की संभावनाओं और कौशल की जरूरतों का सर्वेक्षण।
- 6 महीने के भीतर: कम से कम एक जिलेवार कौशल प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना या मौजूदा संस्थान का आधुनिकीकरण।
- 6 महीने के भीतर: कंपनियों, उद्योगों और प्रशिक्षण संस्थानों के साथ समझौते।
- एक वर्ष के भीतर: सरकारी स्कूलों, ITI और पॉलिटेक्निक में चयनित रोजगारपरक पाठ्यक्रमों का विस्तार।
- एक वर्ष के भीतर: प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं के लिए अप्रेंटिसशिप और प्लेसमेंट व्यवस्था।
- नियमित रूप से: प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं, रोजगार, स्वरोजगार और स्थापित व्यवसायों का सार्वजनिक जिला स्तरीय डैशबोर्ड।
इन लक्ष्यों के लिए विभागों की जिम्मेदारी, बजट और प्रगति की निगरानी भी तय की जानी चाहिए।
पलायन रोकने के लिए शिक्षा को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण बड़ी संख्या में युवा दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं। केवल डिग्री देने से यह समस्या हल नहीं होगी। जरूरत है कि युवाओं को ऐसे कौशल दिए जाएं जिनकी मांग उनके अपने क्षेत्र में भी हो और देश के दूसरे हिस्सों में भी।
यदि किसी पहाड़ी गांव का युवा पर्यटन प्रबंधन, बागवानी, सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिकल कार्य, खाद्य प्रसंस्करण या डिजिटल व्यवसाय में प्रशिक्षित है, तो उसके पास अपने क्षेत्र में रोजगार और स्वरोजगार के विकल्प विकसित करने की संभावना बढ़ सकती है।
इसके लिए शिक्षा, कौशल विकास, उद्योग, पर्यटन, कृषि और रोजगार विभागों के बीच समन्वय आवश्यक है।
बड़ा सवाल: डिग्री के साथ रोजगार देने वाला हुनर कब मिलेगा?
उत्तराखंड में शिक्षा का विस्तार महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन अब अगला लक्ष्य शिक्षा को रोजगार, उद्यमिता और स्थानीय विकास से जोड़ना होना चाहिए।
प्रदेश के युवाओं को केवल सरकारी नौकरी की तैयारी तक सीमित रखने के बजाय उन्हें तकनीकी विशेषज्ञ, कुशल कारीगर, प्रशिक्षित पर्यटन पेशेवर, कृषि उद्यमी और डिजिटल क्षेत्र के रोजगार सृजक बनाने की दिशा में काम करना होगा।
सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद केवल डिग्री लेकर रोजगार की तलाश में भटकने को मजबूर न हो, बल्कि उसके पास कम से कम एक ऐसा व्यावहारिक कौशल हो जिससे वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
उत्तराखंड को अब ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जिसमें किताबों के साथ प्रयोगशाला, कक्षा के साथ कार्यस्थल और डिग्री के साथ हुनर भी मिले। पहाड़ के युवाओं को रोजगार के लिए पलायन करने वाला नहीं, बल्कि अपने प्रदेश में रोजगार पैदा करने वाला बनाने की दिशा में तत्काल कदम उठाने होंगे।

