देहरादून, 31 मार्च 2026** – उत्तराखंड कांग्रेस में एक बार फिर अंदरूनी कलह सिर उठा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश सिंह रावत को पार्टी की केंद्रीय और राज्य नेतृत्व द्वारा कथित रूप से किनारे किया जा रहा है। खासतौर पर रामनगर विधानसभा सीट से जुड़े उनके करीबी सहयोगी संजय नेगी को पार्टी में शामिल करने या सहायता देने के मुद्दे पर हरिश रावत नाराज बताए जा रहे हैं। कांग्रेस के कुछ नेताओं का सीधा आरोप है कि संजय नेगी 2022 के चुनावों में रामनगर सीट पर कांग्रेस की हार के मुख्य जिम्मेदार थे, और वह हरीश रावत खेमे के करीबी माने जाते हैं।
रामनगर सीट पर कांग्रेस ने आखिरी समय में 02 बार के नैनीताल-उधम सिंह नगर सीट से पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र सिंह पाल को टिकट दिया जो कालाढूंगी विधानसभा के निवासी हैं। डॉ. महेंद्र सिंह पाल कांग्रेस के एक अच्छी छवि वाले, प्रसिद्ध और स्तंभ नेता के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध वकील माने जाते हैं। उन्होंने रामनगर से अंतिम 10 दिनों में भी अच्छी लड़ाई लड़ी, लेकिन संजय नेगी ने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस के वोटों में भारी सेंध लगाई और कांग्रेस की हार का कारण बने।
2022 के रामनगर विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार:
- विजेता: दीवान सिंह बिष्ट (BJP) – 31,094 वोट (37.44%)
- उपविजेता: डॉ. महेंद्र सिंह पाल (INC) – 26,349 वोट (31.72%)
- मार्जिन: 4,745 वोट
कुल वैध वोट: लगभग 83,057। कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. महेंद्र सिंह पाल ने मजबूत मुकाबला किया, लेकिन संजय नेगी (Independent) ने 15,000 से अधिक वोट काटे, जिससे सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई। कई कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि संजय नेगी हरिश रावत के प्रभाव या सहमति से मैदान में उतरे और उन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक को विभाजित किया, जिस कारण कुमाऊं में हरीश रावत का विरोध होने के कारण उन्होंने अगला चुनाव हरिद्वार से लड़ना चुना।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 79 वर्षीय हरीश रावत अब उम्रदराज हो चुके हैं और कांग्रेस नेतृत्व ताजा चेहरों को आगे लाने का मन बना चुका है। 2017 और 2022 दोनों विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की भारी हार, हरीश रावत की खुद दोनों सीटों पर हार और उनके कार्यकाल में पार्टी की स्थिति को देखते हुए केंद्रीय और राज्य स्तर के नेता अब उनके दबाव की राजनीति को सहने के मूड में नहीं हैं।
हाल ही में नवंबर 2025 में हुई संगठनात्मक बदलावों में गणेश गोदियाल को उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने और हरक सिंह रावत जैसे नेताओं को महत्व दिए जाने को हरीश रावत के प्रभाव को कम करने का प्रयास माना जा रहा है।
यह विवाद उत्तराखंड कांग्रेस की लंबे समय से चली आ रही फ्रैक्शनलिज्म को फिर उजागर कर रहा है। 2022 के चुनावों में हरीश रावत को शुरू में रामनगर से नामांकित किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें लालकुआं शिफ्ट कर दिया गया, जहां उनको करारी हार देखने को मिली। संजय नेगी ने रामनगर से बागी होकर स्वतंत्र चुनाव लड़ा और कांग्रेस की आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ वोट काटे, जिससे सीट पर हार हुई। कई अन्य सीटों पर भी करीबी मार्जिन से हार का आरोप हरीश रावत के प्रभाव क्षेत्र पर लगाया जा रहा है, जिसमें कद्दावर कांग्रेसी रणजीत रावत ने खुले तौर पर उन्हें कांग्रेस की हार के लिए जिम्मेदार ठहराया।
2022 उत्तराखंड विधानसभा चुनाव
2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 47 सीटें जीतकर सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस मात्र 19 सीटों पर सिमट गई। हरिश रावत खुद लालकुआं सीट से भारी अंतर से हार गए। BJP के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें लगभग 17,527 वोटों से हराया।
रामनगर सीट का मामला विशेष रूप से विवादास्पद रहा। हरिश रावत शुरू में रामनगर से चुनाव लड़ने वाले थे, लेकिन पार्टी ने आखिरी समय में बदलाव करते हुए डॉ. महेंद्र सिंह पाल को टिकट दिया जो अन्य सीट पर लड़ रहे थे, लेकिन लिस्ट आते आते समीकरण बदल गए और आखिरी क्षणों में चुनाव आंतरिक लड़ाई ज्यादा बनकर रह गई। पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र सिंह पाल एक सम्मानित नेता के साथ ही उत्तराखंड हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के दिग्गज वकील भी हैं जिनकी छवि साफ-सुथरी मानी जाती है। उन्होंने रामनगर में अच्छी लड़ाई लड़ी और 26,349 वोट हासिल किए, लेकिन संजय नेगी ने 15,000 से ज्यादा वोट काटकर कांग्रेस की संभावनाओं को कमजोर कर दिया। नतीजतन BJP के दीवान सिंह बिष्ट 31,094 वोटों के साथ 4,745 वोटों के अंतर से जीत गए। बताया जाता है कि कई जगह से कांग्रेस के अपने वोट भी उन्हें नहीं पड़ पाए जिसके पीछे उन्होंने कुछ पार्टी के ही स्वार्थी लोगों की पार्टी के ख़िलाफ़ साजिश बताया।
कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि संजय नेगी की बगावत हरीश रावत की सहमति या प्रभाव से हुई, जिससे पार्टी को रामनगर और आसपास की सीटों पर करीबी अंतर से हार का सामना करना पड़ा। एक पूर्व मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हरीश रावत ने टिकट वितरण में अपना प्रभाव इस्तेमाल किया, लेकिन कई जगह टिकट टकराव हुआ। डॉ. महेंद्र सिंह पाल को आखिरी समय में शिफ्ट किया गया और फिर संजय नेगी ने 15,000+ वोट काटकर सीट कांग्रेस से छीन ली। इससे पार्टी संगठन कमजोर हुआ और BJP को फायदा पहुंचा अब हरीश रावत पार्टी को ही हराने वाले लोगों के लिए लॉबिइंग कर रहे हैं, जिसका अर्थ है कि कार्य कांग्रेस पार्टी के हित के लिए न होकर स्वयं के स्वार्थ सिद्धि के लिए हो रहा है।”
2022 के चुनाव में हरिश रावत पर टिकट बेचने के आरोप भी लगे थे, जिन्हें उन्होंने खारिज करते हुए खुद की पार्टी से निकासी की मांग की थी। हालांकि, पार्टी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अंदरूनी तनाव बढ़ गया। हाल के दिनों में संजय नेगी को पार्टी में शामिल करने के मुद्दे पर फिर विवाद उठा है, जिससे हरीश रावत नाराज बताए जा रहे हैं।
2017 चुनाव: हरीश रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल में भारी हार
2017 के विधानसभा चुनाव में हरिश रावत मुख्यमंत्री थे, लेकिन कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा। BJP ने 57 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस मात्र 11 सीटों पर सिमट गई। स्वयं तब मुख्यमंत्री हरीश रावत खुद दो सीटों – हरिद्वार रूरल और किच्छा – से हार गए।
हरिद्वार रूरल में वे BJP के स्वामी यतींद्रानंद गिरी से करीब 12-13 प्रतिशत वोटों के अंतर से हारे। किच्छा में भी हार का अंतर उल्लेखनीय था। उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में पार्टी की छवि पर सवाल उठे, खासकर 2016 के राजनीतिक संकट (President’s Rule और विश्वास मत) के बाद। कई नेताओं का मानना है कि हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस संगठन मजबूत नहीं हो सका और राज्य में BJP की लहर को नहीं रोक पाया और अगर पार्टी उस असंतोष को पहले भांप लेती तो शायद सरकार गिरने या पार्टी नेताओं द्वारा पाला बदलने की नौबत भी नहीं आती।
एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, “2017 में हरीश रावत के समय कांग्रेस की हार बहुत बड़ी थी। उन्होंने दोनों सीटें गंवाईं। अब 2022 में भी यही स्थिति रही। पार्टी अब पुरानी लीडरशिप पर निर्भर नहीं रहना चाहती।”
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, हरीश रावत संजय नेगी को पार्टी में शामिल करने के पक्ष में थे, लेकिन केंद्रीय और राज्य नेतृत्व ने इसे मना कर दिया। इससे हरीश रावत नाराज बताए जा रहे हैं। एक सूत्र ने कहा, “रावत साहब चाहते थे कि उनके करीबी को जगह मिले, लेकिन पार्टी अब ऐसे दबाव को स्वीकार नहीं कर रही। संजय नेगी की वजह से रामनगर और आसपास की सीटें प्रभावित हुईं। डॉ. महेंद्र सिंह पाल ने अच्छी लड़ाई लड़ी, लेकिन 15,000 से ज्यादा वोट कटने से सीट हाथ से निकल गई।”
यह घटना 2022 के टिकट वितरण में हुई अन्य बगावतों की याद दिलाती है, जहां कांग्रेस में अंदरूनी कलह साफ दिखी। BJP ने इन बगावतों का फायदा उठाया और कई करीबी सीटें जीतीं, जहां कांग्रेस पहले साफ जीतती नज़र आ रही थी।
कांग्रेस नेतृत्व का नया रुख: ताजा चेहरों की जरूरत और हरीश रावत का कथित साइडलाइनिंग
कांग्रेस के केंद्रीय और उत्तराखंड राज्य नेताओं का मानना है कि हरिश रावत अब अपनी ‘समय’ दे चुके हैं। लंबे समय से पार्टी के प्रमुख चेहरे रहे हरिश रावत पांच बार सांसद, मुख्यमंत्री, CWC सदस्य और कई राज्यों में पार्टी की जिम्मेदारी संभालने वाले नेता रहे हैं। लेकिन 2017 और 2022 की हारों के बाद पार्टी में राय बन रही है कि अब नई पीढ़ी को मौका मिलना चाहिए।
नवंबर 2025 में गणेश गोदियाल को उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने, डॉ हरक सिंह को पार्टी में पुनः शामिल करने, करण मेहरा को केंद्रीय एआईसीसी सदस्य बनने से हरीश रावत के प्रभाव से बाहर आने का प्रयास माना जा रहा है। गोदियाल कभी हरीश रावत के करीबी रहे, लेकिन बाद में उनमें दरार आने की बाते की गई। हरीश रावत ने बूथ स्तर पर काम करने की इच्छा जताई, लेकिन इसे व्यंग्य के रूप में देखा गया।
एक राज्य स्तर के नेता ने कहा, “हरीश रावत जी को सम्मान है, लेकिन अब दबाव की राजनीति नहीं चलेगी। कांग्रेस को 2027 के चुनावों के लिए ताजा चेहरों, युवा नेताओं और मजबूत संगठन की जरूरत है। पुरानी फ्रैक्शनलिज्म से पार्टी को नुकसान हो रहा है। रामनगर जैसे मामलों में डॉ. महेंद्र सिंह पाल जैसी अच्छी छवि वाले नेताओं को भी नुकसान उठाना पड़ा।”
उत्तराखंड कांग्रेस में फ्रैक्शनलिज्म: इतिहास और वर्तमान स्थिति
उत्तराखंड कांग्रेस में फ्रैक्शनलिज्म नई बात नहीं है। हरिश रावत बनाम हरक सिंह रावत, गणेश गोदियाल और अन्य गुटों के बीच तनाव लंबे समय से है। 2016 में सरकार गिराने की कोशिश, 2022 में टिकट विवाद, संजय नेगी मामला और हाल की संगठनात्मक बदलाव – ये सभी घटनाएं पार्टी की एकता पर सवाल उठाती हैं।
कई युवा और मध्यम स्तर के नेताओं का कहना है कि हरीश रावत के प्रभाव वाले क्षेत्रों में पार्टी का विस्तार सीमित रहा। अब पार्टी राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति के तहत नई टीम बनाने पर जोर दे रही है।
हरिश रावत की राजनीतिक यात्रा: योगदान और चुनौतियां
हरिश रावत उत्तराखंड राजनीति के दिग्गज हैं। 1970 के दशक से सक्रिय, वे इंदिरा गांधी के करीबी रहे, पांच बार लोकसभा सदस्य बने और 2014-2017 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके कार्यकाल में कुछ विकास कार्य हुए, लेकिन 2013 आपदा के बाद की चुनौतियां, राजनीतिक अस्थिरता और 2017 की हार ने उनकी छवि प्रभावित की।
वे हमेशा से कांग्रेस के ‘ट्रबल शूटर’ रहे – पंजाब, उत्तराखंड आदि में संकट सुलझाने वाले। लेकिन चुनावी मैदान में व्यक्तिगत सफलता सीमित रही। 2022 में हार के बाद भी वे सक्रिय हैं, लेकिन पार्टी अब उन्हें केंद्रीय भूमिका देने से हिचकिचा रही है।
क्या कहते हैं विश्लेषक और पार्टी कार्यकर्ता?
कांग्रेस के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा, “रावत जी का अनुभव मूल्यवान है, लेकिन अब पार्टी को संगठनात्मक सुधार चाहिए। दबाव की राजनीति से युवा नेता हतोत्साहित होते हैं। संजय नेगी जैसी घटनाएं पार्टी की विश्वसनीयता गिराती हैं। डॉ. महेंद्र सिंह पाल जैसी अच्छी छवि वाले नेता को भी वोट कटने से हार का सामना करना पड़ा।”
एक राजनीतिक विश्लेषक ने टिप्पणी की, “उत्तराखंड में BJP मजबूत है। कांग्रेस को जीतने के लिए एकजुट होना होगा। पुरानी लीडरशिप अगर नई पीढ़ी को जगह नहीं देगी, तो 2027 में फिर हार हो सकती है। हरीश रावत को अब सलाहकार भूमिका में रहना चाहिए, लेकिन नियंत्रण नहीं। रामनगर में जिताऊ नेताओं के 15,000+ वोट कटने का मामला पार्टी के लिए सबक होना चाहिए। उत्तराखंड छोटा प्रदेश है और यहां एक एक सीट मायने रखती है, आप किसी सीट को भूलकर भी गंवा नहीं सकते हैं ”
कुछ नेता हरीश रावत के बचाव में कहते हैं कि उन्हें अकेला दोष देना गलत है। पूरे संगठन और राष्ट्रीय परिदृश्य (मोदी लहर आदि) का असर था। लेकिन बहुमत का रुख ताजा चेहरों की ओर है।
भविष्य की संभावनाएं और सुझाव
उत्तराखंड कांग्रेस को 2027 विधानसभा चुनावों से पहले कई कदम उठाने होंगे:
- संगठनात्मक चुनाव: बूथ से लेकर जिला स्तर तक लोकतांत्रिक तरीके से नेतृत्व चुनना।
- युवा और महिला नेताओं को मौका: नए चेहरों को टिकट और जिम्मेदारी।
- टिकट वितरण में पारदर्शिता: बगावत रोकने के लिए सर्वे और मेरिट आधारित फैसले।
- हरीश रावत की भूमिका: सम्मानजनक सलाहकार या मेंटर के रूप में शामिल करना, लेकिन दबाव मुक्त।
- मुद्दा आधारित राजनीति: विकास, पर्यटन, युवा बेरोजगारी, आपदा प्रबंधन पर फोकस।
यदि पार्टी इन मुद्दों को सुलझाती है, तो BJP के खिलाफ मजबूत चुनौती पेश कर सकती है। अन्यथा, आंतरिक कलह जारी रहने से और नुकसान होगा।
कांग्रेस के लिए संक्रमण काल
कांग्रेस का एकजुट हो पाना और हरिश रावत का कथित किनारे किया जाना उत्तराखंड कांग्रेस के लिए नए संकट का संकेत है। संजय नेगी विवाद, 2022 की हार, और पुरानी फ्रैक्शनलिज्म ने पार्टी को कमजोर किया है। कांग्रेस नेतृत्व अब ‘पुरानी समय’ को मानते हुए ताजा चेहरों पर दांव खेल रहा है और गणेश गोदियाल, डॉ हरक सिंह रावत, प्रीतम सिंह, डॉ महेंद्र सिंह पाल, रणजीत सिंह रावत, यशपाल आर्य, करण मेहरा, हरीश धामी जैसे कद्दावर नेता अब रुकने-झुकने के हिसाब से आगे निकलने के लिए पूरा जोर शोर से काम पर लगे हुवे हैं। देखना होगा हरीश रावत की दबाव की राजनीति कुछ असर करती भी है या कांग्रेस पार्टी अब बिना उनके ही आगे बढ़ने के मूड में है यह देखना दिलचस्प होगा।
यह समाचार रिपोर्ट उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं, चुनाव परिणामों (2017 और 2022), संगठनात्मक बदलावों (2025) और राजनीतिक घटनाक्रम पर आधारित है।

