देहरादून, 9 मई 2026:*Report By –B P Singh — उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, जो कभी हरे-भरे वातावरण, शांत वातावरण और बेहतर रहन-सहन के लिए जाना जाता था, आज शहरी समस्याओं के चंगुल में फंस चुका है। फुटपाथों पर भारी अतिक्रमण, स्ट्रीट लाइटिंग की कमी, गंदगी, अपर्याप्त और गंदे सार्वजनिक शौचालय, ट्रैफिक जाम, रिस्पना-बिंदाल नदियों में प्रदूषण और हरित क्षेत्रों की कमी जैसी समस्याएं शहरवासियों के दैनिक जीवन को मुश्किल बना रही हैं। **नगर निगम देहरादून** इन सभी बुनियादी जिम्मेदारियों का मुख्य अधिकारी होने के बावजूद जिम्मेदारी से मुंह मोड़े हुए है। अधिकारी एसी कमरों में बैठकर मीटिंगें करते हैं, हूटर बजाते हुए गाड़ियों में गुजरते दिखते हैं, लेकिन जमीनी समस्याओं का समाधान नहीं होता। मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) की भी शिकायतों पर उदासीनता चिंताजनक है। ईमेल, पत्र और ऑनलाइन शिकायतों पर कोई जवाब, कोई जांच और कोई कार्रवाई नहीं होती। टैक्स चुकाने वाली जनता हाशिए पर है।
### 1. फुटपाथ अतिक्रमण: पैदल चलने लायक जगह तक नहीं बचीदेहरादून की प्रमुख सड़कों पर फुटपाथ नाम को मात्र बचे हैं। सहस्ट्रधारा रोड पर UPCL के बड़े-बड़े आयरन केबल जंक्शन बॉक्स बीच में लगे हुए हैं। दुकानदारों ने अपनी दुकानों को आगे बढ़ा लिया है, रेहड़ी-पटरी वाले सब्जी-फल बेच रहे हैं और स्कूटर्स-कारें पार्क की हुई हैं। शाम होते ही अंधेरा छा जाता है क्योंकि स्ट्रीट लाइट्स या तो खराब हैं या बिल्कुल नहीं हैं। निगम के कार्यालय के बाहर से **जीएमएस रोड** हो या राजपुर रोड या फिर धर्मपुर- रिस्पना (बल्लीवाला चौक से माजरा तक) पर भी यही हाल है। राजपुर रोड, चकराता रोड, हरिद्वार रोड, मसूरी रोड, सहारनपुर रोड, कैनाल रोड, नेहरू कॉलोनी, इंदिरा नगर, वसंत विहार, प्रेम नगर, डालनवाला, खूबड़ताल, बनजारा वाला, टुनथोवाला, मजरा, किशनपुर, नेहरू ग्राम और मोहकंपुर जैसे सभी इलाकों में अतिक्रमण आम है। महिलाएं और युवतियां शाम के बाद अकेले बाहर निकलने से डरती हैं। एक स्थानीय निवासी रीता देवी कहती हैं, “फुटपाथ पर अंधेरा और संकरा रास्ता। पुरुषों की भीड़ में छेड़छाड़ का डर लगा रहता है।” स्कूल जाने वाली लड़कियां और बच्चे सड़क के किनारे चलने को मजबूर हैं। बुजुर्ग और दिव्यांगजन तो घर से निकलने में ही हिचकिचाते हैं।नगर निगम देहरादून फुटपाथ रखरखाव और अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी रखता है, लेकिन sporadically drives के अलावा स्थायी समाधान नहीं होता। UPCL के बॉक्स हटाने या शिफ्ट करने में भी निगम की भूमिका नदारद रहती है। कई महीनों में एक बार निगम की गाड़ी दिख जाती है जो चलान भर निकल जाती हैं और सड़क, फुटपाथ अतिक्रमण से चलते हैं और जिस कारण आम लोग, स्कूली बच्चे, सड़क पर चलने को मजबूर होते हैं, अभिभावक भय से भी अपने बच्चों को गाड़ी लेकर ही स्कूल लाने-लेजाने जाते हैं, पैदल यात्री एक्सीडेंट तक का शिकार हो जाते हैं किंतु निगम बस सुन्न बैठा रहता है और उसकी कोई जवाबदेही नहीं रहती।
### 2. सैनिटेशन और सार्वजनिक शौचालयों की बदहाली–देहरादून में स्वच्छता व्यवस्था नाकाम है। रिस्पना और बिंदाल नदियां खुले नाले बन चुकी हैं। घरेलू कचरा, सीवेज और प्लास्टिक इन नदियों में डाला जाता है। नाले भरे पड़े हैं, जिससे बारिश में जलभराव और मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है। शहर की 10 लाख से ज्यादा आबादी के लिए मात्र 35-40 सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध हैं। ज्यादातर गंदे, बदबूदार, बिना पानी और बिना रखरखाव के हैं। महिलाओं के लिए अलग शौचालय बहुत कम हैं। ISBT, बस अड्डा, रेलवे स्टेशन, पलटन बाजार और माल रोड जैसे व्यस्त इलाकों में स्थिति और खराब है। नगर निगम स्वच्छ भारत मिशन और शौचालय निर्माण-रखरखाव की जिम्मेदारी रखता है, लेकिन ग्राउंड रियलिटी अलग है। कचरा प्रबंधन ठेकेदारों पर निर्भर है, लेकिन नियमित कचरा संग्रहण और डिस्पोजल में कमी है, जिसको व्यवस्थित किए जाने की सख्त आवश्यकता है।
### 3. ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और हरित क्षेत्रों की कमी— निजी वाहनों की बढ़ती संख्या, संकरी सड़कें और अतिक्रमण के कारण चौराहों पर भारी जाम लगता है। निर्माण धूल और वाहन प्रदूषण हवा की गुणवत्ता खराब कर रहा है। तेज कंक्रीटकरण से हरित क्षेत्र घट रहे हैं, भूजल स्तर गिर रहा है और शहरी गर्मी बढ़ रही है। दिन भर सड़कों पर अनचाहे हॉर्न आम बात हैं जबकि जिम्मेदार हूटर बजाकर निकल जाते हैं।
### 4. नगर निगम देहरादून की जिम्मेदारी से बेखबरी— नगर निगम देहरादून शहर की स्वच्छता, फुटपाथ, सड़क रखरखाव, कचरा प्रबंधन, स्ट्रीट लाइटिंग और अतिक्रमण नियंत्रण की मुख्य जिम्मेदारी रखता है। लेकिन व्यवहार में इसका प्रदर्शन निराशाजनक है:- शिकायत पोर्टल पर दर्ज शिकायतों का कोई फॉलो-अप नहीं।- अतिक्रमण हटाने के अभियान प्रतीकात्मक और अस्थायी।- स्ट्रीट लाइट्स की मरम्मत में देरी।- सार्वजनिक शौचालयों का रखरखाव खराब।- अधिकारी जमीनी दौरों की बजाय फाइलों और मीटिंगों में व्यस्त।- हूटर बजाते हुए गुजरने वाले प्रतिनिधि जनता की समस्याओं को नजरअंदाज करते हैं। देहरादून नगर निगम और MDDA की भी ईमेल, पत्र और शिकायतों पर खामोशी है। कई नागरिकों ने बताया कि उन्होंने फुटपाथ और अवैध निर्माण पर दर्जनों शिकायतें भेजीं, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं आई न कभी कार्यवाही हुई। मुख्यमंत्री पोर्टल पर की गई शिकायत भी रफा दफा कर दी जाती है या महीनों तक लंबित ही रहती है।
### 5. नागरिकों की आवाज और प्रभाव— स्थानीय निवासी, महिला संगठन और पर्यटक लगातार शिकायत कर रहे हैं। शहर की रहने योग्यता घट रही है। पर्यटन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ रहा है।
### 6. समाधान और सुझाव- नगर निगम द्वारा मासिक अतिक्रमण हटाओ अभियान।– UPCL के साथ समन्वय कर बॉक्स हटाना।- सभी फुटपाथों पर LED लाइट्स और नियमित मरम्मत।- 100+ नए स्वच्छ शौचालयों का निर्माण और रखरखाव।- शिकायत निपटान में 7 दिन की समयसीमा।- MDDA और निगम में बेहतर समन्वय।- जन भागीदारी और वार्ड कमेटियां।देहरादून की जनता अब इंतजार नहीं करना चाहती। नगर निगम देहरादून को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अगर तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए तो शहर की सुंदरता और रहने योग्यता दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।
**नोट:* यह रिपोर्ट स्थानीय नागरिकों की शिकायतों, मैदानी सर्वे, समाचार रिपोर्टों और सार्वजनिक सूचनाओं पर आधारित है।

