देहरादून |भानु प्रताप सिंह
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों की प्रत्येक भर्ती के साथ आरक्षण व्यवस्था को लेकर बहस तेज होती जा रही है। जहां एक ओर राज्य सरकार सामाजिक न्याय और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने के लिए ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज दोनों प्रकार के आरक्षण लागू कर रही है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं का कहना है कि वास्तविक प्रतिस्पर्धा के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।
राज्य में वर्तमान में अनुसूचित जाति (19%), अनुसूचित जनजाति (4%), अन्य पिछड़ा वर्ग (14%) तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (10%) को मिलाकर कुल 47 प्रतिशत ऊर्ध्वाधर आरक्षण लागू है। इसके अतिरिक्त महिलाओं, राज्य आंदोलनकारियों, भूतपूर्व अग्निवीरों, दिव्यांगजनों, पूर्व सैनिकों, अनाथों तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों के लिए विभिन्न भर्तियों में क्षैतिज आरक्षण भी दिया जाता है।
युवाओं के मन में सबसे बड़ा सवाल
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अनेक अभ्यर्थियों का सवाल है कि यदि किसी भर्ती में 200 पद हैं, तो वास्तव में खुली प्रतिस्पर्धा (Open Competition) के लिए कितनी सीटें उपलब्ध रहती हैं।
यदि केवल ऊर्ध्वाधर आरक्षण लागू माना जाए, तो 200 पदों में लगभग 106 सीटें अनारक्षित (UR/Open) और 94 सीटें आरक्षित वर्गों (SC, ST, OBC, EWS) के लिए निर्धारित होती हैं।
लेकिन इसके बाद महिलाओं, राज्य आंदोलनकारियों, भूतपूर्व अग्निवीरों, दिव्यांगजनों, पूर्व सैनिकों, अनाथों और अन्य क्षैतिज श्रेणियों का समायोजन होता है। इससे अनेक अभ्यर्थियों को यह महसूस होता है कि खुली प्रतिस्पर्धा का दायरा व्यावहारिक रूप से सीमित हो जाता है। आइए अब समझते हैं क्षैतिज आरक्षण का खेल?
एक काल्पनिक उदाहरण क्या बताता है?
यदि 200 पदों पर केवल समझाने के उद्देश्य से एक सरल गणितीय मॉडल बनाया जाए और विभिन्न क्षैतिज आरक्षणों को अलग-अलग माना जाए, तो लगभग 35 सीटें ऐसी दिखाई देती हैं जिन पर कोई क्षैतिज श्रेणी लागू नहीं मानी गई है। इनमें से लगभग 35 सीटें UR/Open श्रेणी में आती हैं। जिसपर कोई भी प्रतिभाग कर सकता है अर्थात जनरल कैटेगरी इसमें भी कुछ ही सीटें मिलनी है। पुराने रिकॉर्ड को देखा जाए तो पाएंगे कि इसमें से भी आधी सीटें आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को चले जाएंगे और effectively 15-20 सीटें भी अनारक्षित वर्ग के युवाओं को नहीं मिल पा रही हैं जो कुल सीटों का 10% भी नहीं है।
200 पदों का काल्पनिक उदाहरण: आरक्षण व्यवस्था को सरल भाषा में समझें
मान लीजिए कि किसी सरकारी विभाग में 200 पदों पर भर्ती निकाली जाती है।
चरण-1: ऊर्ध्वाधर (Vertical) आरक्षण
| श्रेणी | प्रतिशत | सीटें |
|---|---|---|
| UR (Open) | 53% | 106 |
| SC | 19% | 38 |
| ST | 4% | 8 |
| OBC | 14% | 28 |
| EWS | 10% | 20 |
| कुल | 100% | 200 |
इसके बाद इन सभी श्रेणियों के भीतर क्षैतिज आरक्षण लागू किया जाता है।
चरण-2: सरल गणितीय उदाहरण (केवल समझाने के लिए)
| श्रेणी | कुल सीटें | महिला (30%) | राज्य आंदोलनकारी (10%) | अग्निवीर (10%) | अनाथ (5%) | दिव्यांग (5%) | पूर्व सैनिक (5%) | स्वतंत्रता सेनानी आश्रित (2%) | बिना किसी क्षैतिज श्रेणी (काल्पनिक) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| UR/Open | 106 | 32 | 11 | 11 | 5 | 5 | 5 | 2 | 35 |
| SC | 38 | 11 | 4 | 4 | 2 | 2 | 2 | 1 | 12 |
| ST | 8 | 2 | 1 | 1 | 0 | 0 | 0 | 0 | 4 |
| OBC | 28 | 8 | 3 | 3 | 1 | 1 | 1 | 1 | 10 |
| EWS | 20 | 6 | 2 | 2 | 1 | 1 | 1 | 0 | 7 |
| कुल | 200 | 59 | 21 | 21 | 9 | 9 | 9 | 4 | 68 |
इसका क्या अर्थ है?
- 106 सीटें UR/Open हैं और इन पर सभी वर्गों (General, SC, ST, OBC, EWS) के अभ्यर्थी मेरिट के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
- इस सरल काल्पनिक मॉडल में यदि सभी क्षैतिज आरक्षणों को अलग-अलग मान लिया जाए, तो UR/Open की 106 सीटों में लगभग 35 सीटें ऐसी बचती हैं जिन पर कोई विशेष क्षैतिज श्रेणी लागू नहीं मानी गई है।
- इसी प्रकार सभी 200 पदों में लगभग 68 सीटें बिना किसी क्षैतिज श्रेणी वाली दिखाई देती हैं।
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: यह केवल आरक्षण व्यवस्था को समझाने के लिए बनाया गया गणितीय उदाहरण है। वास्तविक उत्तराखंड भर्तियों में रोस्टर प्रणाली, श्रेणियों का ओवरलैप और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश लागू होते हैं।
हालांकि यह केवल एक शैक्षणिक उदाहरण है। वास्तविक भर्ती में यही संख्या अलग हो सकती है क्योंकि क्षैतिज आरक्षण एक-दूसरे से ओवरलैप करते हैं और उनका समायोजन रोस्टर के अनुसार किया जाता है।
क्या UR/Open सीटें केवल सामान्य वर्ग की होती हैं?
यह सबसे बड़ा भ्रम है।
कानूनी रूप से UR (Unreserved/Open) का अर्थ General Category नहीं है। इन सीटों पर SC, ST, OBC, EWS और General—सभी वर्गों के अभ्यर्थी केवल अपनी मेरिट के आधार पर चयनित हो सकते हैं।
यदि कोई SC, ST, OBC या EWS अभ्यर्थी सामान्य मेरिट से चयनित होता है, तो वह UR/Open सीट पर गिना जाता है और उसकी आरक्षित श्रेणी की सीट उसी वर्ग के किसी अन्य पात्र अभ्यर्थी के लिए उपलब्ध रहती है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
आरक्षण कानून से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि क्षैतिज आरक्षण को ऊर्ध्वाधर आरक्षण में जोड़कर कुल आरक्षण प्रतिशत निकालना विधिक रूप से सही नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में स्पष्ट किया है कि क्षैतिज आरक्षण संबंधित ऊर्ध्वाधर श्रेणियों के भीतर समायोजित होता है, इसलिए उसे अलग प्रतिशत जोड़कर “कुल आरक्षण” नहीं माना जा सकता।
फिर विवाद क्यों?
युवाओं का कहना है कि कानूनी परिभाषा अपनी जगह है, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यदि खुली श्रेणी की बड़ी संख्या में सीटें भी विभिन्न क्षैतिज आरक्षणों से चिन्हित हो जाती हैं, तो सामान्य प्रतिस्पर्धा का अवसर सीमित होता हुआ महसूस होता है। इसी कारण “प्रभावी आरक्षण” (Effective Reservation) की चर्चा समय-समय पर उठती रहती है। ऊपर दिए उदाहरण से स्पष्ट है कि कुल आरक्षण लगभग 84% होता है। इसमें अग्निवीर आरक्षण फिलहाल के लिए पुलिस और संबंधित कार्यों पर ही लागू है, जो 10% है, हालांकि इसके अलावा हर भर्ती में अन्य सभी आरक्षण लागू होंगे जिसमें 79% आरक्षण तो सीधे तौर पर सभी में लागू होता है।
दूसरी ओर, आरक्षण समर्थकों का तर्क है कि महिलाओं, दिव्यांगजनों, राज्य आंदोलनकारियों, भूतपूर्व सैनिकों और अन्य विशेष वर्गों को अवसर देना सामाजिक न्याय और समावेशी शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनका कहना है कि इन वर्गों को प्रतिनिधित्व दिए बिना समान अवसर का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। लेकिन 50% की सीमा तोड़कर 84% आरक्षण पहुंच जाना अपने आप में राज्य की कार्य क्षमता क्या प्रभावित भी करेगा?
हालांकि कई लोग इसे मेरिट को मारने का तर्क देते हैं खासकर से जो हॉरिजॉन्टल आरक्षण से स्थिति बदल गई हैं और खासकर इससे जनरल कैटेगरी के पुरुष वर्ग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जो कि राज्य का लगभग 60-65% तक बताया जाता है लेकिन क्षैतिज आरक्षण का नुकसान सभी वर्ग में समानांतर है और उससे होने वाले कार्य पर प्रभाव का आकलन अभी तक किया ही नहीं गया है।
पारदर्शिता की मांग
प्रतियोगी छात्रों और कई सामाजिक संगठनों की मांग है कि प्रत्येक भर्ती के साथ सरकार श्रेणीवार अंतिम रोस्टर, क्षैतिज आरक्षण का समायोजन और सीटों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक करे। उनका कहना है कि इससे भ्रम समाप्त होगा और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा विश्वास दोनों बढ़ेंगे। कई अनारक्षित छात्र परेशान होकर पढ़ाई छोड़ चुके हैं, किंतु बड़े बड़े मीडिया चैनल्स की चकाचौंध में उनकी आवाज ही खो चुकी है।
उत्तराखंड में कानूनी रूप से ऊर्ध्वाधर आरक्षण 47 प्रतिशत है। वहीं क्षैतिज आरक्षण विभिन्न श्रेणियों के भीतर लागू होता है जो लगभग 67% है, जो कुल मिलाकर 84% आरक्षित सीटों को दर्शाता है। हालांकि सीधे कुल आरक्षण प्रतिशत में नहीं जोड़ा जाता। किंतु मौजूदा स्थिति यही दर्शाती है। इसके बावजूद, भर्ती प्रक्रियाओं में क्षैतिज आरक्षण के व्यावहारिक प्रभाव को लेकर बहस लगातार जारी है।
युवाओं का कहना है कि सरकार को ऐसी पारदर्शी व्यवस्था अपनानी चाहिए जिससे प्रत्येक अभ्यर्थी यह स्पष्ट रूप से समझ सके कि किसी भर्ती में वास्तविक प्रतिस्पर्धा के लिए कितनी सीटें उपलब्ध हैं। यही पारदर्शिता भविष्य में विवादों को कम करने और भर्ती प्रणाली में विश्वास बढ़ाने का सबसे प्रभावी उपाय हो सकती है।

