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जिला सूचना अधिकारी गिरिजा शंकर जोशी का आकस्मिक निधन: अधिकारी से बढ़कर पत्रकारों, छात्रों और समाज के अपने व्यक्ति थे

पिथौरागढ़ से नैनीताल तक शिक्षा और जनसेवा की मिसाल, छात्रों के लिए अपना कमरा तक कर दिया था उपलब्ध

नैनीताल/पिथौरागढ़।
उत्तराखंड के सूचना विभाग से जुड़े जिला सूचना अधिकारी गिरिजा शंकर जोशी के आकस्मिक निधन की खबर से पत्रकारिता, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है। उनका अंतिम संस्कार चित्रशिला घाट पर किया जाएगा। अचानक हुए इस निधन ने उन तमाम लोगों को स्तब्ध कर दिया है, जो उन्हें केवल एक सरकारी अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक सहज, मिलनसार और समाज के प्रति संवेदनशील व्यक्ति के रूप में जानते थे।

सरल स्वभाव के धनी और समाज, पत्रकारों और छात्रों से विशेष सम्बंध

गिरिजा शंकर जोशी की पहचान सिर्फ सूचना विभाग के अधिकारी की नहीं थी। पिथौरागढ़ में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने विद्यार्थियों के लिए जिस तरह काम किया, उसकी याद आज भी वहां के कई छात्र और स्थानीय लोग करते हैं।

बताया जाता है कि सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को मूलभूत सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता था। ऐसे समय में जोशी ने विद्यार्थियों की समस्याओं को केवल प्रशासनिक फाइल का विषय नहीं माना, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी उनके समाधान का प्रयास किया।

छात्रों के पढ़ने के लिए उन्होंने अपना कमरा तक उपलब्ध कराया। विद्यार्थियों के लिए कुर्सी, मेज, किताबें और स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं जुटाने में उन्होंने योगदान दिया। यह पहल उस समय खास मायने रखती थी, जब पहाड़ के दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले अनेक छात्र सीमित संसाधनों के बीच प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा की तैयारी करते थे। उन्होंने पिथौरागढ़ में छात्रों को एक नया माहौल बना दिया और नवाचारों के लिए प्रेरित किया।

इसी वजह से पिथौरागढ़ के कई विद्यार्थियों के लिए गिरिजा शंकर जोशी सिर्फ ‘जिला सूचना अधिकारी’ नहीं रहे—वे एक ऐसे अधिकारी बने जिन्होंने विद्यार्थियों की जरूरत को समझा और उनके बीच खड़े होकर मदद की।

‘अधिकारी’ की दूरी नहीं, आम लोगों से अपनापन

उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता उनका लोगों के प्रति सहज और मिलनसार व्यवहार बताया जाता है। सरकारी पद की औपचारिकता के बावजूद आम लोगों, पत्रकारों और विद्यार्थियों के साथ उनका व्यवहार आत्मीय रहा।

पहाड़ के प्रशासनिक ढांचे में ऐसे अधिकारियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जो सरकारी व्यवस्था और आम नागरिक के बीच दूरी कम कर सकें। जोशी ने अपने व्यवहार से इसी विश्वास को मजबूत किया।

उनसे जुड़े लोगों के अनुसार, उनके लिए जनसेवा केवल सरकारी दायित्व तक सीमित नहीं थी। विद्यार्थियों के लिए छोटी-छोटी सुविधाओं की व्यवस्था करने से लेकर उनकी समस्याओं को सुनने तक, वे व्यक्तिगत रुचि लेते थे।

पिथौरागढ़ आज भी याद रखेगा यह योगदान

पिथौरागढ़ जैसे सीमांत और पर्वतीय जिले में शिक्षा के लिए संसाधनों की उपलब्धता आज भी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में विद्यार्थियों तक सुविधाएं पहुंचाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण है।

ऐसे माहौल में यदि कोई अधिकारी विद्यार्थियों के लिए अपनी व्यक्तिगत सुविधा तक छोड़कर व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास करे, तो उसका प्रभाव पद और कार्यकाल से कहीं आगे जाता है।

गिरिजा शंकर जोशी की यही विरासत शायद उन्हें सबसे अलग बनाती है।

आकस्मिक मौत ने एक और गंभीर सवाल खड़ा किया—दिल के रोगों को लेकर सरकार कब गंभीर होगी?

गिरिजा शंकर जोशी के आकस्मिक निधन के बीच समाज में बढ़ती हृदय संबंधी गंभीर घटनाओं और हार्ट अटैक को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। भारत में हार्ट अटैक मौत का बड़ा कारक बन चुका है जिसपर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

आज हृदय रोग केवल बुजुर्गों की बीमारी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उच्च रक्तचाप, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, मोटापा, धूम्रपान, अस्वास्थ्यकर खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता जैसे कई कारक हृदय रोग के जोखिम को बढ़ाते हैं।

हालांकि किसी व्यक्ति की मृत्यु का वास्तविक चिकित्सकीय कारण केवल मेडिकल जांच और चिकित्सकीय रिकॉर्ड से ही निर्धारित किया जा सकता है, लेकिन ऐसी घटनाएं जनस्वास्थ्य व्यवस्था को चेतावनी जरूर देती है

इन उपायों को केवल किसी दुखद घटना के बाद नहीं, बल्कि एक स्थायी जनस्वास्थ्य नीति के रूप में लागू किया जाना चाहिए।

एक अधिकारी की विदाई, लेकिन एक सोच की विरासत

गिरिजा शंकर जोशी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पिथौरागढ़ के विद्यार्थियों के लिए उन्होंने जो छोटे-छोटे प्रयास किए, वे उनकी बड़ी विरासत हैं।

सरकारी पद मिलना एक बात है, लेकिन उस पद को लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए इस्तेमाल करना दूसरी बात।

पिथौरागढ़ के वे विद्यार्थी, जिनके लिए उन्होंने पढ़ने की जगह, कुर्सी-मेज, किताबें और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने का प्रयास किया, शायद उनकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि हैं।

उनका जाना केवल एक अधिकारी का जाना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जनोन्मुखी प्रशासनिक सोच का जाना है।

देवभूमि के लोग न्यूज़ की ओर से गिरिजा शंकर जोशी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और उनके परिवार, मित्रों, विद्यार्थियों तथा शुभचिंतकों को यह अपार दुख सहने की शक्ति दें

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