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उत्तराखंड कैबिनेट विस्तार: धामी सरकार में पांच नए चेहरों की एंट्री, क्षेत्रीय संतुलन पर बड़ा फोकस; विपक्ष ने उठाए सवाल

देहरादून। शुक्रवार 20 मार्च 2026 को लोक भवन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार में कैबिनेट का विस्तार हो गया। पांच विधायकों ने राज्यपाल से मंत्री पद की शपथ ली। इस विस्तार के साथ अब कैबिनेट की कुल संख्या 10 हो गई है। पहले पांच मंत्री थे और पांच पद खाली पड़े थे। यह कदम 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें क्षेत्रीय समीकरण, जातीय संतुलन और प्रदर्शन आधारित चयन प्रमुख रहे।नए मंत्रियों की सूची इस प्रकार है:-

*खजान दास (राजपुर, देहरादून): दलित चेहरा, पूर्व कैबिनेट मंत्री, अनुभवी नेता।

*मदन कौशिक (हरिद्वार): पांच बार के विधायक, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष (2021 से), 2007-2012 और 2017-2021 तक मंत्री रह चुके।

*प्रदीप बत्रा (रुड़की, हरिद्वार): तीन बार के विधायक, 2017 में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए।

*भरत चौधरी (रुद्रप्रयाग): वरिष्ठ नेता, दो बार के विधायक।

*राम सिंह कैंड़ा (भीमताल, नैनीताल): पूर्व स्वतंत्र विधायक, हाल में भाजपा में शामिल।शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री धामी मौजूद रहे। नए मंत्रियों को अभी पोर्टफोलियो आवंटित नहीं किए गए हैं, लेकिन जल्द ही विभागों का बंटवारा होने की संभावना है।

क्षेत्रीय प्रबंधन के मुद्दों पर विस्तार से समझें

उत्तराखंड में क्षेत्रीय संतुलन हमेशा से एक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण मुद्दा रहा है। राज्य दो प्रमुख मंडलों—गढ़वाल और कुमाऊं—में बंटा हुआ है। गढ़वाल मंडल (पौड़ी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, देहरादून, हरिद्वार आदि) पहाड़ी इलाकों, सीमा सुरक्षा, पर्यटन और आपदा प्रबंधन से जुड़ा है, जबकि कुमाऊं (नैनीताल, अल्मोड़ा, उधम सिंह नगर, बागेश्वर, पिथौरागढ़) मैदानी इलाकों की कृषि, उद्योग और प्रवास की समस्याओं से जूझता है।

पिछली कैबिनेट में गढ़वाल का भारी प्रतिनिधित्व था—सतपाल महाराज और धन सिंह रावत (पौड़ी गढ़वाल), सुबोध उनियाल (टिहरी)। कुमाऊं से केवल रेखा आर्या (अल्मोड़ा) और सौरभ बहुगुणा (उधम सिंह नगर) थे। इससे कुमाऊं क्षेत्र में असंतोष की आवाजें उठती रहीं। विकास योजनाओं, बजट आवंटन और पदोन्नति में गढ़वाल को ज्यादा तवज्जो दिए जाने के आरोप लगते रहे। पहाड़ी जिलों में युवा पलायन, सड़क-बिजली की कमी और कुमाऊं के मैदानी इलाकों में औद्योगिक विकास की मांग अलग-अलग थी।

इस विस्तार ने इन क्षेत्रीय प्रबंधन के मुद्दों को काफी हद तक संबोधित किया है।

*हरिद्वार से दो नए मंत्री (मदन कौशिक और प्रदीप बत्रा) मैदानी गढ़वाल का प्रतिनिधित्व मजबूत कर रहे हैं, जहां सिख समुदाय और प्रवासी आबादी की बड़ी भूमिका है।

*देहरादून से खजान दास दलित वर्ग के साथ-साथ राजपुर क्षेत्र (शहर-ग्रामीण मिश्रित) को आवाज दे रहे हैं।

*रुद्रप्रयाग से भरत चौधरी उच्च हिमालयी गढ़वाल का संतुलन बना रहे हैं, जहां केदारनाथ यात्रा और आपदा प्रबंधन प्रमुख चुनौतियां हैं।

*नैनीताल से राम सिंह कैंड़ा कुमाऊं का प्रतिनिधित्व बढ़ा रहे हैं, जो पर्यटन, झील संरक्षण और कृषि से जुड़े मुद्दों को कैबिनेट स्तर पर मजबूती देगा।

इस तरह अब गढ़वाल-कुमाऊं में लगभग बराबर का संतुलन हो गया है। मैदानी और पहाड़ी दोनों क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ है। यह न सिर्फ राजनीतिक स्थिरता के लिए जरूरी है बल्कि शासन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। क्षेत्रीय असंतुलन से विकास योजनाएं प्रभावित होती हैं—जैसे कुमाऊं में सड़क परियोजनाएं लंबित रहती थीं या गढ़वाल में स्वास्थ्य सुविधाओं पर ज्यादा जोर दिया जाता था। नए मंत्रियों की मौजूदगी से जिला-स्तरीय मुद्दों पर तेज फैसले हो सकेंगे, बजट का बेहतर वितरण होगा और स्थानीय जनता का विश्वास बढ़ेगा।

कैबिनेट विस्तार जातीय समीकरणों को भी ध्यान में रखकर किया गया है। दलित चेहरा खजान दास, अनुभवी और नए चेहरों का मिश्रण, पूर्व कांग्रेसियों का भाजपा में शामिल होना—सभी ने सामाजिक समीकरण साधने में मदद की। यह कदम 2027 चुनाव से पहले पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और संगठन को मजबूत करने का संदेश भी देता है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

कांग्रेस सहित विपक्ष ने इस कैबिनेट विस्तार पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि यह विस्तार भाजपा के आंतरिक असंतोष और संगठन-सरकार के बीच तालमेल की कमी को छिपाने की कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने में देरी से विधायकों में नाराजगी बढ़ी थी, और अब चुनावी फायदे के लिए जल्दबाजी में यह कदम उठाया गया है। कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि नए मंत्रियों का चयन क्षेत्रीय संतुलन के नाम पर किया गया है, लेकिन असल में यह भाजपा के भीतर चल रही अंतर्कलह और असंतुष्ट विधायकों को शांत करने का प्रयास है। विपक्ष का कहना है कि धामी सरकार विकास और जन मुद्दों पर फोकस करने के बजाय राजनीतिक खेल में लगी हुई है, और ऐसे विस्तार से राज्य के असली मुद्दों का समाधान नहीं होगा। कांग्रेस ने इसे “चुनावी जुमला” करार देते हुए कहा कि जनता 2027 में इसका जवाब देगी।

मुख्यमंत्री धामी की सरकार अब पूर्ण क्षमता से काम कर सकेगी। खाली पड़े विभागों जैसे वित्त, राजस्व, परिवहन आदि के बोझ से मुख्यमंत्री को राहत मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विस्तार न सिर्फ क्षेत्रीय प्रबंधन के लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों का समाधान है बल्कि inclusive governance की दिशा में एक ठोस कदम है। उत्तराखंड की भौगोलिक विविधता को ध्यान में रखते हुए ऐसे संतुलन से राज्य की प्रगति और तेज होगी। सरकार की ओर से जल्द ही नए मंत्रियों को विभाग सौंपे जाने की उम्मीद है, जिससे विकास कार्यों में नई गति आएगी। यह विस्तार भाजपा को आगामी चुनावों में मजबूत स्थिति देने वाला साबित हो सकता है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक मजबूरी बताकर हमला कर रहा है।

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